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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 276 of 404

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Page 276

( २५८ ) माधवनिदान ।
आर्तव सर्वथा बीजत्व नष्ट न होनेसे संतानके करनेवाले होते हैं और जीवसंक्रमण
कालमें कदाचित् बीज दुष्ट होय तो विषके कीडेके न्याय करके सन्तान प्रगट होती
है अर्थात् जैसे विष प्राणियोंके प्राणका नाशक है परन्तु उसमें भी विषका कीडा
प्रगट होता है और वह उससे नहीं मरता है यह वाग्भटका मत है ॥
साध्यादिभेद ।
साध्यं त्वग्रक्तमांसस्थं वातश्लेष्माधिकं च यत् ।
मेदसि द्वन्द्वजं याप्यं वर्ज्यं मज्जास्थिसंसृतम् ॥ ३२ ॥
कृमिहृल्लासमन्दाग्निसंयुक्तं यत्त्रिदोषजम् ।
प्रभिन्नं प्रस्रुताङ्गं च रक्तनेत्रं हतस्वरम् ॥
पंचकर्मगुणातीतं कुष्ठं हंतीह कुष्ठिनम् ॥ ३३ ॥
रस रुधिर मांस इन धातुओंके पर्यंत गये जो कुष्ठ वे साध्य होते हैं तथा जिस
कुष्ठमें वायु और कफ प्रधान होय वह भी साध्य है और मेदोधातुगत कुष्ठ तथा
द्वंद्वजकुष्ठ याप्य जानना । मज्जा अस्थि इन दोनों धातुमें कुष्ठ पहुँच गया हो तथा
जो शुक्रगत हो वह कुष्ठ असाध्य है तथा जिस कुष्ठमें कृमि, वमन, मन्दाग्नि इन
करके युक्त होय तथा त्रिदोषज होय वह असाध्य है। जो कुष्ठ फूटकर बहने लगे
तथा जिस कुष्ठसे रोगीके नेत्र लाल होयँ अथवा स्वर बैठ गया होय और वमन
विरेचनादि पंचकर्मके गुण जिस पुरुषके नहीं होयँ ऐसा रोगी मर जाय ॥
कुष्ठमें प्रधानदोषके लक्षण ।
वातेन कुष्ठं कापालं पित्तेनौदुंबरं कफात् ॥ ३४ ॥
मंडलाख्यं विचर्ची च ऋक्षारव्यं वातपित्तजम् ।
चर्मैककुष्ठं किटिभं सिध्मालसविपादिकाः ॥ ३५ ॥
वातश्लेष्मोद्भवाः श्लेष्मपित्ताद्दद्रुशतारुषी ।
पुण्डरीकं सविस्फोटं पामा चर्मदलं तथा ॥ ३६ ॥
सर्वैः स्यात्काकणं पूर्वं त्रिकं दद्रूः सकाकणा ।
पुंडरीकर्षजिह्वे च महाकुष्ठानि सप्त तु ॥ ३७ ॥
बादीसे कापालकुष्ठ, पित्तसे औदुंबर, कफसे मण्डल और विचर्चिका, वातपित्तसे
ऋक्षजिह्व, वातकफसे चर्मकुष्ठ, किटिभ, सिध्म, अलस और विपादिका, कफपित्तसे
दद्रु, शतारु, पुंडरीक, विस्फोटक, पामा, चर्मदल, त्रिदोषसे काकणकुष्ठ होय है,
पहिले तीन (कापाल, उदुंबर और मण्डल), दद्रु, काकण, पुंडरीक और ऋक्षजिह्व
ये सात महाकुष्ठ जानने ॥