माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
by माधवकर
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेत । (२२५)
स्रावनिर्गम ।
नाभेरुपरिजाः पक्वा यान्त्यूर्ध्वमितरे त्वधः ।
अधः स्रुतेषु जीवेत्तु स्रुतेषूर्ध्वं न जीवति ॥ १६ ॥
नाभिके ऊपर जो विद्रधि होय उनके पकनेसे जो स्राव कहिये राध आदिका
बहना होय वह मुखके रास्ते होय है और नाभिके नीचे होनेसे जो स्राव होय वह
गुदाके मार्गसे होय है और नाभिके समीप होनेवाली विद्रधियोंका स्राव दोनों मार्गोंसे
होय । जिनका स्राव नीचेके मार्ग हो वह रोगी जीवे और ऊपरके मार्ग जिसका
स्राव होय वह रोगी बचे नहीं ॥
विद्रधिमें साध्यासाध्य ।
हृन्नाभिवस्तिवर्ज्या ये तेषु भिन्नेषु बाह्यतः ।
जीवेत्कदाचित्पुरुषो नेतरेषु कथंचन ॥ १७ ॥
साध्या विद्रधयः पञ्च विवर्ज्यः सान्निपातिकः ।
आमपक्वविदग्धत्वं तेषां शोथवदादिशेत् ॥ १८ ॥
हृदय, नाभि और वस्ति इन ठिकानोंको छोडकर प्रगट जो विद्रधि अर्थात्
प्लीहा क्लोम इत्यादि ठिकाने बाहर फूटनेसे कदाचित् पुरुष बचजाय और ठिका-
नेपर फूटनेसे नहीं बचे । पहली पांच विद्रधि साध्य हैं, सन्निपातकी विद्रधि असाध्य
है, इन विद्रधियोंको आम, पक्व और विदग्ध ये तीन अवस्था शोथरोगके समान
जाननी चाहिये ॥
असाध्य लक्षण ।
आध्मातं बद्धनिष्यन्दं छर्दिहिक्कातृषान्वितम् ।
रुजाश्वाससमायुक्तं विद्रधिर्नाशयेन्नरम् ॥ १९॥
अफरायुक्त, मूत्र रुकगया होय, हिचकी, वमन और प्यास इनसे पीडित शूल,
श्वास इन करके युक्त ऐसे मनुष्यके विद्रधिरोग असाध्य होय है ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
विद्रधिनिदानं समाप्तम् ॥
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