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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 209 of 404

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Page 209

भाषाटीकासमेत । ( १९१ )
संयोग भेदकी कैसे प्रतीति हो ऐसे कोई पूछे तो उसके वास्ते कहते हैं-मूत्रके
वर्णादिभेदसे समान कारणोंके भेद कल्पना करने चाहिये जैसे-घट (घडा) बनानेके
समय मृत्तिकादि कारण सामग्रीमें भेद नहीं है परन्तु कुम्भकारादि (कुम्हार आदि)
प्रयत्नभेद करके घडा सरवा मटकना आदि अनेक जातिभेद हो जाते हैं और यह तो
तत्तत् (उन उन) आहारादिकोंका जो अदृष्ट फल है वेही संयोगभेदके हेतु हैं ॥
कफकी १० प्रमेहके लक्षण ।
अच्छं बहु सितं शीतं निर्गन्धमुदकोपमम् । मेहत्युदकमेहेन
किंचिदाविलपिच्छिलम् ॥ ८ ॥ इक्षो रसमिवात्यर्थं मधुरं चेक्षु-
मेहतः। सान्द्रीभवेत्पर्युषितं सान्द्रमेहेन मेहति ॥९॥ सुरामेही
सुरातुल्यमुपर्यच्छमधो घनम् । संहृष्टरोमा पिष्टेन पिष्टवद्ब-
हुलं सितम्॥१०॥ शुक्राभं शुक्रमिश्रं वा शुक्रमेही प्रमेहति ।
मूत्राणूसिकतामेही सिकतारूपिणो मलान्॥११॥ शीतमेही
सुबहुशो मधुरं भृशशीतलम् । शनैः शनैः शनैर्मेही मन्दं मन्दं
प्रमेहति ॥ लालातन्तुयुतं मूत्रं लालामेहेन पिच्छिलम् ॥ १२ ॥
१-उदकप्रमेहकरके स्वच्छ बहुत सफेद शीतल गन्धरहित पानीके समान कुछ
गाढा और चिकना मूते है। २-इक्षुप्रमेहसे ईखके रससमान अत्यन्त मीठा ऐसा
मूत्र होय । ३-सांद्रप्रमेहसे रात्रिमें पात्रमें धरनेसे जैसा होवे ऐसा मूत्र होय । ४-सुरा-
प्रमेहसे-दारूके समान ऊपर निर्मल और नीचे गाढा ऐसा मूते । ५-पिष्टप्रमेहसे
पिसे चावलोंके पानीसमान सफेद और बहुत मूते तथा मूतते समय रोमांच होय ।
६-शुक्रप्रमेहसे शुक्र (वीर्य) के समान अथवा शुक्रमिला मूत्र होय । ७-सिकता-
मेहसे मूत्रके कण और बालूरेतके समान मलके रवा गिरे । ८-शीतमेहसे मधुर तथा
अत्यन्त शीतल ऐसा बारबार बहुत मूते । ९-शनैर्मेहसे धीरे २ और मन्द मन्द
मूते । १०-लालाप्रमेहसे लारके समान तारयुक्त और चिकना मूत्र होय है ॥
पित्तकी ६ प्रमेहकं लक्षण ।
गन्धवर्णरसस्पर्शैः क्षारेण क्षारतोयवत् ॥ १३ ॥ नीलमेहेन
नीलाभं कालमेही मषीनिभम् । हारिद्रमेही कटुकं हरिद्रा-
सन्निभं दहेत् ॥ १४ ॥ विस्रं माञ्जिष्ठमेहेन मञ्जिष्ठासलिलोप-
मम् । विस्रमुष्णं सलवणं रक्ताभं रक्तमेहतः ॥ १५ ॥
११-क्षारप्रमेहसे खारी जलके समान गन्ध वर्ण रस और स्पर्श ऐसा मूत्र होता
है । १२-नीलप्रमेहसे नीले रंगका अर्थात् पपैया पक्षीके पंखके सदृश मूते ।