माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
by माधवकर
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेत । (१९७)
पसीने बहुत आवे अथवा नहीं आवें, शरीर काला होजाय, शरीरमें स्पर्शका
ज्ञान जाता रहे और थोडीसी चोट लगनेसे पीडा अधिक होय, संधि ढीली होजायँ
आलस्य आवे, ग्लानि हो, शरीरमें फुन्सी उठें, घोंटू, जंघा, ऊरू, कमर, कन्धा,
हाथ, पैर, सन्धि और अंगोंमें सूईके चुभानेकीसी पीडा होय, स्फुरण ( फरकना ),
तोडनेकीसी पीडा, भारीपण, बधिरता ये लक्षण होते हैं और संधियोंमें खुजली
चले और शूल होकर वारंबार नाश होजाय, शरीरका विवर्ण होजाय, रुधिरके
चकत्ता देहमें पडजायँ ये वातरक्तके पूर्वरूप होते हैं ॥
अब वातरक्तको अन्य दोषोंका संसर्ग होनेसे उसके लक्षण
न्यारे न्यारे लिखते हैं-
वाताधिकेऽधिकं तत्र शूलस्फुरणतोदनम् । शोथश्च रौक्ष्यं
कृष्णत्वं श्यावतावृद्धिहानयः ॥ ९ ॥ धमन्यङ्गुलिसन्धीनां
सङ्कोचोऽङ्गग्रहोऽतिरुक् । शीतद्वेषानुपशयस्तम्भवपथुसुप्तयः १०
वाताधिक वातरक्तमें शूल, अंगोंका फरकना, चोटनेकीसी पीडा ये अधिक होते
हैं । सूजन, रूखापना, नीलापना अथवा श्यामवर्णता एवं वातरक्तके लक्षणोंकी
वृद्धि होय और क्षणभरमें ह्रास ( कम ) हो, धमनी और अंगुलियोंकी संधियोंमें
संकोच, शरीर जकडबंध होय, अत्यन्त पीडा होय, सर्दी बुरी लगे और शीतके
सेवन करनेसे दुःख होय, स्तम्भ होय, कम्प और शून्यता हो ये लक्षण होते हैं ॥
रक्ताधिकके लक्षण ।
रक्ते शोफोऽतिरुक्क्लेदस्ताम्रश्चिमचिमायते ।
स्निग्धरूक्षैः शमं नैति कण्डूक्लेदसमन्वितः ॥ ११ ॥
रक्ताधिक वातरक्तमें सूजन, अत्यन्त पीडा और उसमेंसे तांबेके रंगका क्लेद बहे,
उस सूजनमें चिमचिम वेदना होय, स्निग्ध अथवा रूखे पदार्थोंसे शांति न होय,
उसमें खुजली और पानी निकले ॥
पित्ताधिकके लक्षण ।
पित्ते विदाहः संमोहः स्वेदो मूर्च्छा मदः सतृट् ।
स्पर्शासहत्वं रुग्रागः शोफः पाको भृशोष्णता ॥ १२ ॥
पित्ताधिक वातरक्तमें अत्यन्त दाह, इंद्रियोंको मोह, पसीना, मूर्च्छा, मस्त रहना,
प्यास, स्पर्श बुरा मालूम हो, पीडा, लाल रंग, सूजन, छोटे छोटे पीले फोडे, अत्यन्त
गरमी ये लक्षण होते हैं ॥