Skip to content
SarvaKosh
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 163 of 404

Read in context
Page 163

भाषाटीकासमेत । ( १४५ )
प्याक्षिपेन्मोहयेत्तथा । स कृच्छ्रादुच्छ्वसेच्चापि स्तब्धाक्षोऽथ
निमीलकः ॥ २९ ॥ कपोत इव कूजेच्च निस्संज्ञः सोऽप-
तन्त्रकः । दृष्टिं संस्तभ्य संज्ञां च हत्वा कण्ठेन कूजति ॥ ३० ॥
हृदि मुक्ते नरः स्वास्थ्यं याति मोहं वृते पुनः । वायुना
दारुणं प्राहुरेके तदपतानकम् ॥ ३१ ॥
रूक्षादि स्वकारणोंसे कोपको प्राप्त भई जो वायु सो अपने स्थानको छोड ऊपर
जाकर प्राप्त हो और हृदयमें जाकर पीडा करे, मस्तक और कनपटी इनमें पीडा
करे और देहको धनुषके समान नवाय देवे और चले तो मूर्च्छित कर दे, वह रोगी
बडे कष्टसे श्वास ले, नेत्र जकड जावें अथवा मिच जावें, कबूतरके समान गूंजे
तथा बेहोश हो इस रोगको अपतंत्रक कहते हैं । दृष्टिका स्तंभन हो जाय, संज्ञा
जाती रहे, गलेमें घुरघुर शब्द होय, वायु जब हृदयको छोडे तब रोगीको होश होय
और वायु हृदयको व्याप्त करे तब फेर मोह हो जाय । इस भयंकर रोगको कोई
अपतानक ऐसे कहते हैं ॥
अब कहते हैं कि, दण्डापतानक, अन्तरायाम, बहिरायाम और अभिघात इन भेदोंसे
आक्षेपकयोग चार प्रकारका है, उनके लक्षण लिखते हैं-
दंडापतानकके लक्षण ।
कफान्वितो भृशं वायुस्तास्वेव यदि तिष्ठति ।
दण्डवत्स्तंभयेद्देहं स तु दण्डापतानकः ॥ ३२ ॥
वायु अत्यन्त कफयुक्त होकर सब धमनी नाडियोंमें प्राप्त हो और सब देहको
दण्ड (लकडी) के समान स्तब्ध जकड दे वह दंडापतानक होता है ॥
अब अन्तरायाम और बहिरायाम इनके साधारण रूपको कहते हैं-
धनुस्तुल्यं नमेद्यस्तु स धनुःस्तम्भसंज्ञितः ।
जो वायु धनुषके समान शरीरको बांका कर दे उसको धनुःस्तंभसंज्ञक कहते हैं ॥
अन्तरायामके लक्षण ।
अङ्गुलीगुल्फजठरहृद्वक्षोगलसंश्रितः। स्नायुप्रतानमनिलो यदा
क्षिपति वेगवान् ॥ ३३ ॥ विष्टब्धाक्षः स्तब्धहनुर्भग्नपार्श्वः
कफं वमन् । अभ्यन्तरं धनुरिव यदा नमति मानवः ॥ ३४ ॥
तदा सोऽभ्यन्तरायामं कुरुते मारुतो बली ॥ ३५ ॥