माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
by माधवकर
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेत । ( १२३ )
भरा भया है कौन ऐसा स्ववश अथवा सुकृती पुरुष ऐसे निंद्य मद (अमल) का
सहनशील होता है किन्तु कोई नहीं होता. कैसे कि, सिंह व्याघ्रादि हिंसक पशु जिस
वनमें बहुत हैं ऐसे निर्जन वनमें मार्गमें कौन चतुर मनुष्य जायगा। शंका-चरक
विदेह वाग्भट आदि आचार्योंने तो चतुर्थमद कहा ही नहीं है और सुश्रुतने
कहा है इनमें विरोध क्यों है ? उत्तर-चरकमें जो दूसरे और तीसरेमें अन्तर
कहा है सोही सुश्रुतने तृतीय मदको मानकर उसके लक्षण कहे हैं और जो चरकमें
तृतीय मदके लक्षण कहे हैं, सो सुश्रुतने चतुर्थ मदके लक्षण कहे हैं। ऐसे विरोध
नहीं हैं, वास्तवमें तीनही मद हैं। शंका- योंजी ! एकमदसे तीन प्रकारके मद
होते हैं इसमें क्या कारण है ? उत्तर-मद्य यह अग्निके समान है जैसे अग्निमें सुवर्ण
( सोना ) तपानेसे, उत्तम मध्यम अधमकी परीक्षा होती है ऐसे ही मद्य भी
सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुणवाले पुरुषोंकी प्रकृतिसूचक है अर्थात् सत्त्वगुणवाले
पुरुषको प्रथम मद, रजोगुणवाले पुरुषको दूसरा मद, तमोगुणवाले पुरुषको तीसरा
मद प्राप्त होता है। सो चरकमें लिखा है ॥
विधिहीन मद्यसेवनसे और विकार होते हैं उनको कहते हैं-
निर्भुक्तमेकान्तत एव मद्यं निषेव्यमाणं मनुजेन नित्यम् ।
आपादयेत्कष्टमान्विकारानापादयेच्चापि शरीरभेदम् ॥ ११ ॥
जिस पुरुषने अन्नरहित निरन्तर मद्यपान नित्य करा होय वह अत्यन्त दुःख-
दायक विकार (पानात्ययादिक) उत्पन्न करे है और शरीरका विनाश करे है ॥
अन्नके साथ मद्य सेवन करा भया भी क्रुद्धादिकारणोंसे
विकारकर्त्ता होता है, सो कहते हैं--
क्रुद्धेन भीतेन पिपासितेन शोकाभितप्तेन बुभुक्षितेन ।
व्यायामभाराध्वपरिक्षतेन वेगावरोधाभिहतेन चापि ॥ १२ ॥
अत्यम्लभक्ष्यावततोदरेण साजीर्णभुक्तेन तथाऽबलेन ।
उष्णाभितप्तेन च सेव्यमानं करोति मद्यं विविधान्विकारान् १३॥
क्रोधयुक्त, भयसे पीडित, प्यास, शोकवान्, क्षुधायुक्त, दंड कसरत और भारसे
जो क्षीण हो गया होय, मलमूत्रादि वेगसे पीडित हो, अत्यन्त अम्लरस खानेसे
जिसका पेट भरा रहा हो, अजीर्णमें भोजन करनेवाले पुरुषके निर्बल पुरुषके गरमीसे
तपायमान ऐसे मनुष्यके मद्य सेवन करनेसे अनेक विकार उत्पन्न होते हैं ॥
१ प्रधानावरमध्यानां रुक्माणां व्यक्तिदर्शकः। यथाग्निरेवं सत्त्वानां मद्यं प्रकृतिदर्शकम् ॥