Skip to content
SarvaKosh
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 133 of 404

Read in context
Page 133

भाषाटीकासमेत । (११६)
अथ मूर्च्छानिदानम् ।
निदान और सम्प्राप्ति ।
तृष्णा में मोह होता है, इसी से तृष्णाके अनन्तर मूर्च्छाको कहते हैं-
क्षीणस्य बहुदोषस्य विरुद्धाहारसेविनः । वेगाघातादभीघाता-
द्दीनसत्त्वस्य वा पुनः ॥ १ ॥ करणायतनेषूग्रा बाह्येष्व्वा-
भ्यन्तरेषु च । निविशन्ते यदा दोषास्तदा मूर्च्छन्ति मानवाः
॥ २ ॥ संज्ञावहासु नाडीषु पिहितास्वनिलादिभिः । ततो-
ऽभ्युपैति सहसा सुखदुःखव्यपोहकृत् ॥ ३ ॥ सुखदुःखव्यपोहा-
च्च नरः पतति काष्ठवत् । मोहो मूर्च्छेति तामाहुः षड्विधा
सा प्रकीर्त्तिता ॥ ४ ॥ वातादिभिः शोणितेन मद्येन च विषेण
च । षट्स्र्वप्येतासु पित्तं तु प्रभुत्वेनावतिष्ठते ॥ ५ ॥
क्षीण पुरुषके बहुत दोषके सञ्चय होनेसे, विरुद्ध आहार क्षीर मत्स्यादिकके सेवन
करनेसे, मल मूत्रादि वेगके धारणकरनेसे, लकडी आदिके चोट लगनेसे, अथवा
जिस पुरुषका सत्त्वगुण क्षीण होगया हो ऐसे पुरुषकी मनके आयतन (स्थान) बाहरकी
चक्षु आदि हैं उसमें और भीतरके मनके बहानेवाली सोतोंमें प्रबल वातादि दोष
कुपित हुए जब ठहरते हैं तब मनुष्य मूर्च्छाको प्राप्त होता है। संज्ञाके बहनेवाली
नाडियोंमें वातादि दोषों करके आच्छादित होनेसे सुखदुःखका ज्ञान नष्ट होय तब
मनुष्य पृथ्वीपर काष्ठकी तरह गिरे। इस रोगको मूर्च्छा अथवा मोह ऐसे कहते
हैं। अथवा बाहरकी इन्द्रिय-नेत्र, कान आदि कर्मेन्द्रिय और बुद्धीन्द्रिय इनमें
बलवान् दोष (वात, पित्त, कफ) प्रवेश कर संज्ञाकी बहनेवाली जो नाडी तिनको
वह वात, पित्त, कफ रोक अन्धकारको प्रगट करे तब मनुष्य काष्ठकी भांति पृथ्वीपर
गिरे उसको मूर्च्छा कहते हैं अथवा मोह कहते हैं। सो मूर्च्छा छः प्रकारकी
है-वात, पित्त, कफसे तीन प्रकारकी और रुधिर, विष और मद्य इन भेदोंसे तीन
प्रकारकी, इन तीनों मूर्च्छाओंमें पित्त है सो मुख्य प्रधान है अथवा व्यापक है ॥
१ उक्तं चाभिधानांतरे-संज्ञोपघाते मूर्च्छीया मूर्च्छा स्यान्मूर्च्छनं तथा ।
कश्मलं प्रलयो मोहः संन्यासस्तु मृतोपमः ॥ इति ॥