माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
by माधवकर
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेत । (८९)
शिरसः परिपूर्णत्वमभक्तच्छन्द एव च ।
कासः कण्ठस्य चोद्ध्वंसो विज्ञेयः कफकोपतः ॥ ७ ॥
एकादशभिरेतैर्वा षड्भिर्वापि समन्वितम् ।
कासातिसारपार्श्वार्तिस्वरभेदारुचिज्वरैः ॥ ८ ॥
त्रिभिर्वा पीडितं लिङ्गैर्ज्वरकासासृगामयैः ।
जह्याच्छोषार्दितं जन्तुमिच्छन्सुविपुलं यशः ॥ ९ ॥
यह राजयक्ष्मा त्रिदोषसे उत्पन्न है इसमें दोषोंके न्यारे न्यारे मिलाय कर सब
ग्यारह रूप हैं, ये व्याधिके प्रभावसे होते हैं। सन्निपातज्वरके सदृश सर्वलक्षण सब
दोषोंसे नहीं होते पृथक् पृथक् होते हैं। सो दिखाते हैं-बादीके प्रभावसे स्वरभेद,
कन्धे और पसवाडोंमें संकोच और पीडा हो, पित्तसे ज्वर, दाह, अतिसार और
मुखसे रुधिरका गिरना और कफके कोपसे मस्तकका भारीपना, अन्नसे द्वेष,
खांसी, स्वरभेद ये लक्षण होते हैं, इसमें तीन तो वातसे और चार लक्षण पित्तसे
तथा चारही लक्षण कफसे ऐसे सब ग्यारह लक्षणसे अथवा खांसी, अतिसार,
पसवाडोंमें पीडा, स्वरभेद, अरुचि और ज्वर इन छः लक्षणोंसे अथवा ज्वर खांसी
और रुधिरविकार इन तीन लक्षणोंसे पीडित क्षयीरोगवाले मनुष्य तथा जिसका
बल मांस क्षीण होगया हो ऐसे रोगीको यशकी इच्छावाला वैद्य त्याग दे ऐसा
रोगी असाध्य है ॥
साध्यासाध्य विचार ।
सर्वैरधैँस्त्रिभिर्वापि लिङ्गैरैर्वापि बलक्षये ।
युक्तो वर्ज्यश्चिकित्स्यस्तु सर्वरूपोऽप्यतोऽन्यथा ॥ १० ॥
स्वरभेदादिक जो ग्यारह लक्षण कहे उन सब लक्षणों करके अथवा उनमेंसे आधे
अर्थात् छः लक्षणोंसे अथवा तीन लक्षण कहे इनसे युक्त जो क्षयीरोगी बल, मांस
क्षीण होनेपर त्याज्य है। यदि बल, मांस जिसका क्षीण न भया हो परन्तु सर्व-
लक्षण युक्त भी है तथापि त्याज्य नहीं है, उसकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥
असाध्य लक्षण ।
महाशिनं क्षीयमाणमतिसारनिपीडितम् ।
शूनमुष्कोदरं चैव यक्ष्मिणं परिवर्जयेत् ॥ ११ ॥
जो बहुत भोजन करे परन्तु दिनप्रति क्षीण होता जाय वह असाध्य रोगी है,
अतिसार करके अत्यन्त पीडित हो सो रोगी भी असाध्य होता है. क्योंकि क्षय-
रोगवालेका जीना मलके आधीन है । जैसे लिखा है-“मलायत्तं बलं पुंसां शुक्रा-