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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 101 of 404

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Page 101

भाषाटीकासमेत । ( ८३ )
पित्तं विदग्धं स्वगुणैर्विदहत्याशु शोणितम् ।
ततः प्रवर्त्तते रक्तमूर्ध्वं वाऽधो द्विधापि वा ॥ २ ॥
ऊर्ध्वं नासाक्षिकर्णास्यैर्मेढूयोनिगुदैर्धः ।
कुपितं रोमकूपैश्च समस्तैस्तत्प्रवर्त्तते ॥ ३ ॥
धूपमें बहुत डोलनेसे, अति परिश्रम करनेसे, शोकसे, बहुत मार्ग चलनेसे, अति
मैथुन करनेसे, मिरच आदि तीखी वस्तु खानेसे, अग्निके तापनेसे जवाखार आदि
खारे पदार्थ, नोनसे आदि ले लवणके पदार्थ, खट्टी कडुवी ऐसी वस्तुओंके खानेसे
कोपको प्राप्त भया जो पित्त सो अपने तीक्ष्ण द्रव पूति इत्यादि गुणोंसे रुधिरको
बिगाडे तब रुधिर ऊपरके अथवा नीचेके मार्ग अथवा दोनों मार्ग होकर प्रवृत्त
हो निकले ( ऊपरके मार्ग, नाक, नेत्र मुख इनके द्वारा निकले ) और अधोमार्ग
कहिये लिंग गुदा और योनि इनके रास्ते होकर निकले और जब रुधिर अत्यन्त
कुपित होय तब दोनों मार्ग और सब रोमछिद्रोंके द्वारा निकले हैं ॥
रक्तपित्तका पूर्वरूप ।
सदनं शीतकामित्वं कण्ठधूमायनं वमिः ।
लोहगन्धिश्च निश्वासो भवत्यस्मिन् भविष्यति ॥ ४ ॥
ग्लानि, शीतकी इच्छा, कण्ठसे धूआं निकलना, वमन और तपाये भये लोहेपर
जल गेरनेसे जैसी गन्ध आवे ऐसी श्वास लेनेसे गन्धका आना जिस मनुष्यमें इतने
लक्षण मिलते होयँ उसको जानना कि, इसके रक्तपित्त प्रगट होवेगा ॥
कफयुक्त रक्तपित्तके लक्षण ।
सान्द्रं सपाण्डु सस्नेहं पिच्छिलं च कफान्वितम् ।
सघन, कुछ पीला और कुछ चिकना तथा गाढा ऐसा रक्तपित्त कफमिश्रित
जानना॥
वातिक रक्तपित्तके लक्षण ।
श्यावारुणं सफेनं च तनु रूक्षं च वातिकम् ॥ ५ ॥
नीलवर्ण, लालवर्ण, कुछ झागयुक्त, पतला और रूखा ऐसा रक्तपित्त
वातका जानना ॥
पैत्तिक रक्तपित्तके लक्षण ।
रक्तपित्तं कषायाभं कृष्णं गोमूत्रसंनिभम् ।
मेचकागारधूमाभमञ्जनाभं च पैत्तिकम् ॥ ६ ॥
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