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कुमारसम्भवम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कुमारसम्भवम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kumarasambhavam of Kalidasa with Hindi Commentary

by महाकवि कालिदास / पं. सीताराम चतुर्वेदी

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DevanagariSanskritpublished268 pages

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( २५१ )
(b) “O thou of stooping limbs, henceforth I am
thy slave, bought by the austerities”—as the
Moon-crested God said these words, she
immediately forgot ( all ) her exhaustion
caused by the austerities : for, fatigue gives
fresh vigour again by the fruition ( i. e. the
achievement of the desired object )
III. (a) जब शंकर जी ब्रह्मचारी का रूपधारण कर पार्वती के
पास आये तब पार्वती ने उठकर उनका खूब सत्कार
किया इसी विषय पर कवि कहता है कि विशेष
व्यक्तियो में लोगो का कृत्य भी आदर पूर्ण होता है
अर्थात् यद्यपि कोई बराबर वाला भी हो तो भी स्थिर
चित्त लोग विशेष व्यक्तियो में विशेष प्रकार का व्यवहार
करते हैं ।
(b) शङ्कर को अपना पति न बनाने के लिये मना करते
हुये ब्रह्मचारी ने पार्वती से कहा तुम शिव के योग्य
नहीं हो । उसी बात को कवि समझाता है कि
यज्ञस्तम्भ के लिये जो वेद की क्रिया प्रयुक्त की जाती
है वह क्रिया श्मशान के खम्भे के लिये नहीं की जा
सकती । अर्थात् पार्वती के योग्य शिव नहीं हैं ।
IV. तुषारवृष्टिक्षतपद्मसम्पदाम्—तुषार वृष्ट्या क्षता
पद्मसंपदो यासां तासां तुषारवृष्टिक्षतपद्मसम्पदाम्
(b) शरव्य—शरगोसाधुः शरणा+शयत् सुगंधि—सुगंधोऽ
स्यास्तीति—सुगंध+इतच् ।