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कुमारसम्भवम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कुमारसम्भवम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kumarasambhavam of Kalidasa with Hindi Commentary

by महाकवि कालिदास / पं. सीताराम चतुर्वेदी

DevanagariSanskritpublished268 pages

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( २४५ )
बड़ी प्रसन्न हुईं और उनका सारा कष्ट दूर हो गया ।
क्योंकि फल मिल जाने पर ( मनोरथ सफल हो जाने
पर ) सब कष्ट भूल जाता है । उसी बात को कवि ने
यहां बतलाया है ।
(b) पार्वती जी की तपस्या से प्रसन्न होकर शङ्कर जी
ब्रह्मचारी का वेष धारण कर उनके पास गये थे और
उनसे सत्कार पाकर पूछने लगे कि हे पार्वती सब
कुशल तो है क्योकि शरीर ही सब धर्मों का साधन
है। यही बात कवि ने अर्थान्तरन्यास से कहा है। यदि
शरीर कुशल रहेगा तो सभी धर्मकृत्य ठीक से हो
सकेंगे।
IV (a) For the formation of वार्धक see note श्लोक 44.
(b) अरुणाय—'क्लृपिसंपद्यमाने च' से इसमें चतुर्थी हुई
है। अर्थात् जहां पर कोई वस्तु किसी वस्तु के वास्ते
पर्याप्त दिखाई जाती है वहां चतुर्थी होती है।
QUESTIONS 1940.
I. Explain the following in Sanskrit in tika
form :—
(a) शुचौ चतुर्णां ज्वलतां हविर्भुजाम्
शुचिस्मिता मध्यगता सुमध्यमा
विजित्य नेत्रप्रतिघातिनीं प्रभा
मनन्यदृष्टि सवितारमैक्षत