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किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

by महाकवि भारवि

Source: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (origin)

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DevanagariHindipublished707 pages

Page 379 of 707

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Page 379

अष्टमः सर्गः १२१

नखांशूत्करमञ्जरीभृतः = स्फुरन्नखकिरणपुञ्जमञ्जरीयुताः। विलासिनीबाहुलताः = सुरसुन्दरीभुजलताः। सिषेविरे = भेजिरे। अत्र रूपकालङ्कारः।

कोषः—'भुजबाहू प्रवेष्टो दोः' इत्यमरः।

हिन्दी—अङ्गरागादिलेपन की सुगन्ध पर आकृष्ट वनभ्रमरों ने पतली लाक्षारस से रंगे हुए हाथोंवाली सुरसुन्दरियों की भुजलाताओं का सेवन किया। उनके नाखूनों से निकलती हुई किरणें मञ्जरियों के समान ज्ञात होती थीं॥५॥

निपीयमानस्तवका शिलीमुखैरशोकयष्टिश्चलवालपल्लवा।
विडम्बयन्ती ददृशे वधूजनैरमन्ददष्टौष्ठकरावधूननम् ॥ ६ ॥

अन्वयः—शिलीमुखैः निपीयमानस्तवका चलवालपल्लवा अमन्ददष्टोष्ठकरावधूननम् विडम्बयन्ती अशोकयष्टिः ददृशे।

विग्रहः—निपीयमानः स्तवकः यस्याः सा = निपीयमानस्तवका। चलाः बालपल्लवाः यस्याः सा = चलवालपल्लवा। अमन्दं दष्ट ओष्ठो यस्मिन्, तत्करावधूननम् = अमन्ददष्टोष्ठकरावधूननम्। अशोकस्य यष्टिः = अशोकयष्टिः।

अर्थः—शिलीमुखैः = भ्रमरैः। निपीयमानस्तवका = पीयमानगुच्छा। चलवालपल्लवा = चञ्चलनूतनदला। अमन्ददष्टोष्ठकरावधूननम् = दृढदष्टोष्ठकरकम्पनम्। विडम्बयन्ती = अनुकुर्वती। अशोकयष्टिः = अशोकशाखा। ददृशे = दृष्टा।

कोषः— 'अलिबाणौ शिलीमुखौ' इत्यमरः।

हिन्दी—भ्रमरों ने अशोकलता के पुष्पगुच्छों का मधुपान कर लिया था उसके नये निकले हुए पत्ते इस प्रकार हिल रहे थे जैसे तीक्ष्ण ओष्ठदंश (ओष्ठ में काटना) के कारण भौरों को उड़ाने के लिए हाथ अप्सराओं के हिल रहे हों। (यह दृश्य सुरसुन्दरियों के लिए बड़ा मनोरम था) ॥ ६ ॥

अथ कश्चिद् मधुपाक्रान्तां काञ्चिदाह—

करौ धुनाना नवपल्लवाकृती वृथा कृथा मानिनि मा परिश्रमम्।
उपेयुषी कल्पलताभिशङ्कया कथं न्वितस्त्रस्यति षट्पदावलिः ॥ ७ ॥

अन्वयः—हे मानिनि ! नवपल्लवाकृती करौ धुनाना वृथा परिश्रमं मा कृथाः कल्पलताभिशङ्कया उपेयुषी षट्पदावलिः कथं नु इतः त्रस्यति।