किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
by महाकवि भारवि
Source: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (origin)
DevanagariHindipublished707 pages
Page 318 of 707
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६० | किरातार्जुनीयम्
कोष:--'सारो बले स्थिरांशे च न्यासे क्लीबं वरे त्रिषु' इत्यमरः ।
**हिन्दी--**जिस प्रकार अर्जुन का भाग्य सर्वथा अनतिक्रमणीय, शीघ्र होने-वाला तथा अनेक फलों से युक्त महान् था उसी प्रकार नीलमणिपर्वत भी था। पूर्ण बल लगाकर भी उसे कोई पार नहीं कर सकता था। बहुत समय से अर्जुन इस विशाल पर्वत पर आने के लिए इच्छुक थे। इस प्रकार इन्द्रनील पर्वत पर अर्जुन पहुँच गये ॥ ५२ ॥
इति भारविकृतो सुधाटीका-संबलित-किरातार्जुनीये पञ्चमः सर्गः ।