किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
by महाकवि भारवि
Source: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (origin)
Page 23 of 707
Read in context[ १५ ]
‘भद्रे ! तुम इस पद्यको किसी धनी व्यापारीके हाथ बेच डालो और उससे वस्त्र आदि आवश्यक पदार्थ खरीद लो’। ऐसा कहकर उस पद्यको उन्हें दे दिया। उनकी पत्नीने उस पद्यको एक धनी व्यापारीको दिखलाया। उसने उसे पढ़कर प्रसन्न होकर उन्हें सौ अशर्फियां दे दीं, और अपने घरमें चित्ररूपमें सज्जित कर उसे टांग दिया। प्रसङ्गवश वह व्यापारी व्यापारके लिए दूसरे द्वीपमें चला गया था। कई वर्षोंके बाद व्यापारी रातमें जब घर आया और अपनी पत्नीको एक कुमारके साथ सोई हुई देखा तो उसे व्यभिचारिणी समझकर खड्गसे प्रहार करनेके लिए तत्पर हुआ। संयोगवश भारविके उसी पद्य पर जो कि दीवारमें टाँगा गया था, उसकी दृष्टि पड़ी और उसने पत्नी को जगाया। उसने पतिको देखकर प्रसन्न होकर कहा—‘यह तुम्हारा पुत्र है’। तब उस व्यापारीको सन्तोष हुआ।
उधर भारवि छः महीने तक क्लेशपूर्ण प्रायश्चित्त भोगकर सप्तममासके प्रथम दिनमें श्वशुरगृहसे पत्नीके साथ प्रस्थानकर अपने घर आ गये एवम् माता-पिता-की सेवा करते हुए रहने लगे और प्रवासमें आरब्ध किरातार्जुनीयको पूर्ण करके उसके प्रचारसे यश और सम्पत्तिका उपार्जन कर सुखपूर्वक समय व्यतीत करने लगे।
पहलेकी किंवदन्तीकी अपेक्षा इसकी ज्यादा प्रसिद्धि है।