किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
by महाकवि भारवि
Source: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (origin)
Page 184 of 707
Read in context( १६ )
तपस्या करनी है वहाँ पर यह यक्ष तुम्हें शीघ्र ही पहुँचा देगा ऐसा कहकर जैसे ही व्यास जी अन्तर्धान हुए वैसे ही अर्जुन के पास यक्ष उपस्थित हो गया तब उन्हें जाने के लिये उद्यत देख द्रौपदी अर्जुन से कहने लगी।
अर्जुन के प्रति द्रौपदी की उक्ति
जबतक तपस्या पूरी न हो तबतक आप हमलोगों के बिना व्यग्र न होना क्योंकि बिना दृढ़ आग्रह के कोई सिद्ध नहीं होता और उन्हें तपस्या के लिये उत्तेजित करने के लिये पुनः कहने लगी कि—संसार में तेजस्वी पुरुषों की मान-हानि प्राण-हानि के तुल्य ही होती है, शत्रु से पराजित होने पर उनका अपमान होता है और शत्रुओं ने जो-जो दुर्व्यवहार किये हैं और जिन्हें कि—मैं स्मरण भी नहीं करना चाहती, आज मुझे वे ही सब तुम्हारे बिना यद्यपि और भी कष्ट पहुचायेंगे तथापि उन सबों को इस आशय से सहूँगी कि आप शीघ्र ही शत्रुओं को जीतने योग्य सामर्थ्य प्राप्त कर पुनः मिलेंगे। अतः अब आप तपस्या के लिये जायँ और आपके समस्त विघ्नों को इन्द्र भगवान् दूर करें। हे नाथ ! आप व्यास जी का आदेश पालन करते हुए हमलोगों के मनोरथ को सफल करें। अब आपको कृतकार्य देखकर पुनः आनन्द से आलिङ्गन करना चाहती हूं। तब इन सब बातों को सुनकर अर्जुन को दुर्योधनादिकों के ऊपर अत्यन्त क्रोध हुआ वह कवच पहन-कर तलवार, धनुष और तरकश लेकर यक्ष के बताये हुये रास्ते से इन्द्रकील पर्वत पर तपस्या करने के लिये चल पड़े। उनके जाने पर सब लोगों को अत्यन्त दुःख मालूम पड़ने लगा, पर समझाकर किसी भाँति अपने-अपने चित्त को शांत किया। उस समय मङ्गल-सूचक दिव्य दुन्दुभी शब्द तथा आकाश में पुष्पवर्षा होने लगी जिसे देखकर सब अत्यन्त प्रसन्न हुये।
| व्याख्याता—<br>गोरखपुर विश्वविद्यालय | —उमेशचन्द्र पाण्डेय |
|---|