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किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

by महाकवि भारवि

Source: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (origin)

DevanagariHindipublished707 pages

Page 18 of 707

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दशम सर्ग--नृत्य, गीत और वाद्य आदि प्रयोगोंसे अविचलित अर्जुनकी तपस्याको भङ्ग करनेके प्रयासके असफल होनेसे वे अप्सराएँ और गन्धर्व इन्द्रके पास लौट गये।

एकादश सर्ग--यह सब वृत्तान्त सुनकर इन्द्र वृद्ध ब्राह्मणका रूप लेकर यात्रासे परिश्रान्त-से होकर अर्जुनके पास पहुँचते हैं और बाण आदि धारण कर तपस्या करनेका कारण पूछते हैं। तब अर्जुनके अपने उद्देश्यको सूचित करनेपर इन्द्र अहिंसा और शान्तिके महत्त्वका प्रतिपादन करते हैं। तब अर्जुन अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार अपने कर्त्तव्यका समर्थन करते हैं। अनन्तर प्रसन्न होकर इन्द्र अपने रूपमें प्रकट होकर अर्जुनको आलिङ्गन कर उन्हें शिवजीकी उपासना करनेका उपदेश देकर अन्तर्हित हो जाते हैं।

द्वादश सर्ग--तब अर्जुन शिवजीकी आराधना करनेके लिए कठोर तपस्या करने लगे। तपस्या करते हुए तेजस्वी अर्जुनको दर्शक लोग शिवजी, इन्द्र और अग्निके समान देखने लगे तथा उनके तपःप्रभावके सहन करनेमें असमर्थ होकर शिवजीकी स्तुति करने लगे। तब शिवजीने प्रत्यक्ष होकर उनको 'ये बदरिका-श्रमवासी नारायण हैं'—ऐसा कहकर अर्जुनका परिचय दिया और फिर कहा कि 'अर्जुनकी तपस्याको देवकार्य समझकर मूक नामका दानव शूकरका रूप लेकर उन्हें मारनेके लिए आयेगा। मैं भी किरातका वेष धारण कर उसे शरप्रहारसे मार डालूँगा। उसी समय अर्जुन भी उसपर शरप्रहार करेंगे। अनन्तर दोनोंके बाणोंसे गिरे हुए उसके शरीरसे बाण लेनेके विषयमें मेरे भृत्यसे अर्जुनका कलह होगा।' ऐसा कहकर उन्हें सान्त्वना देकर शिवजी किरातपतिका वेष लेकर और उनके प्रमथसैन्यगण भी किरातका वेष लेकर अर्जुनसे युद्ध करनेके लिए सन्नद्ध हो गये।

त्रयोदश सर्ग--तब अर्जुन विशाल शरीरवाले शूकरको अपनी ओर आते हुए देखकर अनेक तर्कणा करने लगे और उसपर गाण्डीव धनुपर शर लेकर प्रहार करनेके लिए तत्पर हुए। यह देखकर शिवजीने भी उसपर शरप्रहार किया। एक साथ दोनोंके बाणप्रहारसे वह शूकर निष्प्राण होकर भूतलपर गिर पड़ा। तब प्रचुर बाणोंसे रहते हुए भी अर्जुन उसके शरीरसे बाण लेनेके लिए तत्पर हुए। उसी समय उन्होंने किरातपति शिवजीके भृत्य एक किरातको आते देखा।