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किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

by महाकवि भारवि

Source: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (origin)

DevanagariHindipublished707 pages

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उतर आते हैं। अर्जुन की वीरता से प्रसन्न होकर भगवान् शिव प्रकट होते हैं तथा अर्जुन की पाशुपतास्त्र-प्राप्ति की अभिलाषा पूरी होती है और महाकाव्य पूरा होता है :-

व्रज जय रिपुलोकं पादपद्मानतः सन्, गदित इति शिवेन श्लाघितो देवसंघैः ।
निजगृहमथ गत्वा सादरं पाण्डुपुत्रो, धृतगुरुजयलक्ष्मीधर्मसूनुं ननाम ॥ १८.४०

'जाओ अपने शत्रुओं को जीतो' ऐसा आशीर्वाद प्राप्त कर अर्जुन लौट आते हैं एवं युधिष्ठिर के चरणों में सादर प्रणाम करते हैं।

महाभारत एवं किरातार्जुनीयम् की कथा में अन्तर

यद्यपि 'किरातार्जुनीयम्' की कथा 'महाभारत' पर ही आधारित है, फिर भी कवि ने अपनी ओर से काव्य में पर्याप्त सामग्री जोड़ डाली है। केवल कथामात्र का ही अवलम्बन करने पर सात सर्गों तक कथा समाप्त हो सकती थी, किन्तु कवि ने इसे १८ सर्गों में वर्णन किया है। वास्तव में कवि अपनी प्रतिभा से उसमें नवीन रुचि का सृजन करता है एवं कथा को सजीवता प्रदान करता है।

( १ ) सर्वप्रथम कवि ने पात्रों के स्वरूप में भी पर्याप्त परिवर्तन कर दिया है। महाभारत के उद्दत भीम भारवि के हाथों एक सुयोग्य राजनीतिज्ञ बन जाते हैं।

( २ ) महाभारत में व्यास मन्त्र का उपदेश युधिष्ठिर को देते हैं और युधिष्ठिर अर्जुन को, किन्तु 'किरातार्जुनीयम्' के व्यास अर्जुन को ही उपदेश देते हैं।

( ३ ) महाभारत में अर्जुन इन्द्रकील पर्वत पर मन की गति से भी तीव्र मन्त्र की शक्ति से पहुँच जाते हैं। 'किरात' में यक्ष उन्हें पहुँचाता है।

( ४ ) इन्द्र, अर्जुन को मोहित करने के लिये 'किरातार्जुनीयम्' में, अप्सराओं को भेजता है, जिनका वर्णन चार सर्गों में किया गया है, फिर इन्द्र एक वृद्ध तपस्वी का वेश धारण कर आते हैं और अर्जुन की तपस्या से विरत होने को कहते हैं। महाभारत के अनुसार अर्जुन के इन्द्रकील पर्वत पर पहुँचते ही इन्द्र तपस्वी वेश में मिलते हैं।

( ५ ) महाभारत में शिव किरात का वेश धारण कर उमा के साथ आते हैं, और अर्जुन से अकेले लड़ते हैं। 'किरातार्जुनीयम्' में वे सेनासहित लड़ते हैं; किन्तु अर्जुन उनकी सेना को तितर-बितर कर देते हैं। सेना का वर्णन करके कवि अर्जुन की वीरता के महत्त्व की वृद्धि कर देता है। युद्ध के वर्णन में भी कवि भारवि का वर्णन अधिक सजीव है जब कि महाभारत का युद्ध वर्णन नीरस एवं शुष्क है।

( ६ ) युद्ध का अन्त भी दोनों में भिन्न रूप से होता है। महाभारत में अर्जुन बेहोश हो जाते हैं और जब होश में आते हैं तो किरात के सिर पर वही माला देखते हैं जो