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किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

by महाकवि भारवि

Source: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (origin)

DevanagariHindipublished707 pages

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महाकवि भारवि और किरातार्जुनीय

संस्कृतसाहित्यमें कवि प्रचुर परिमाणमें देखे गये हैं, परन्तु सहृदय निकषार्थ-में सम्मान पानेके लिए दो-चार ही कवि समर्थ हुए हैं। कविकृतियोंमें भारविकी कृति किरातार्जुनीय बृहत्त्रयी और पञ्च काव्योंमें भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। बृहत्त्रयीमें तीन महाकाव्य परिगणित हैं, उनमें भारविका किरातार्जुनीय, माघका शिशुपालवध और श्रीहर्षका नैषधीयचरित चर्चित हैं। इसी तरह पञ्च काव्योंमें भी कालिदासके रघुवंश और कुमारसंभव, भारविका किरातार्जुनीय, माघका शिशुपालवध और श्रीहर्षका नैषधीयचरित महाकाव्य गणित हुए हैं। दोनों स्थलोंमें भारविकी कृति और उनके नामका निर्देश विशिष्ट लोक-प्रियता और कालक्रमके अनुरूप हैं।

महाभारतके वनपर्वमें वर्णित पाण्डवचरितके आधारपर किरातार्जुनीय महाकाव्यका प्रणयन हुआ है। 'उपमा कालिदासस्य, भारवेरर्थगौरवम्।' इस सूक्तिके अनुसार उपमामें कालिदास बेजोड़ हैं तो अर्थगौरवमें भारविका अप्रतिम स्थान है। अर्थात् परिमित शब्दोंमें अर्थोंकी गूढताके प्रदर्शनमें भारवि अपनी सानी नहीं रखते हैं। अत एव प्रसिद्ध है—

'भारवेरर्थगौरवम्' और 'नारिकेलफलसम्मितं वचः'

अर्थात् नारियल फलके समान भारविके वचन गूढ़ हैं, ऐसी लोकप्रसिद्धि है। उनकी रचना एकमात्र किरातार्जुनीयके होनेपर भी 'एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति, न च तारागणोऽपि च।' इस उक्तिके अनुसार एकमात्र किरातार्जुनीय महाकाव्य ही उनके यशको चिरस्थायी करनेमें पर्याप्त है।

कालिदासके समान माधुर्य न होनेपर भी उनका महाकाव्य अन्तरंगवत् और बहिर्जगतके मनोहर वर्णनसे सहृदयोंका हृदयाकर्षण करनेके लिए परिपूर्ण है। किरातार्जुनीयमें रस, भाव, ध्वनि, गुण, शब्दालङ्कार और अर्थालङ्कार प्रचुर परिमाणमें प्रदर्शित हैं। ऐहोल शिलालेखके अनुसार ६३४ ई० के ही भारवि कालिदासके साथ परिगणित हैं। भारविका संस्कृतजगत्में वंशपरम्परागत अधिकार है। उनकी रचनामें च्युतसंस्कृति कहीं भी नहीं पायी जाती है। इसी प्रकारसे शब्दोंके प्रयोगमें भी वे परिनिष्ठित हैं। परवर्ती कवियोंने उनका उपकार लिया