केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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१३२ | केनोपनिषद् | [ खण्ड. ४
पद-भाष्य
[वाम भाग / संस्कृत मूल]
कर्मात्मज्ञानोपायत्वमित्येवं ह्ययं
विभागो युज्यते अर्थसम्बन्धोप-
पत्तिसामर्थ्यादिति चेत् ।
न; अयुक्तेः । न ह्ययं वि-
भागो घटनां प्राञ्चति । न हि
सर्वक्रियाकारकफलभेदबुद्धितिर-
स्कारिण्या ब्रह्मविद्यायाः शेषा-
पेक्षा सहकारिसाधनसम्बन्धो वा
युज्यते । सर्वविषयव्यावृत्तप्रत्य-
गात्मविषयनिष्ठत्वाच्च ब्रह्म-
विद्यायास्तत्फलस्य च निःश्रेय-
सस्य । "मोक्षमिच्छन्सदा कर्म
त्यजेदेव ससाधनम् । त्यजतैव
हि तज्ज्ञेयं त्यक्तुः प्रत्यक्परं
पदम्" तस्मात्कर्मणां सहकारित्वं
कर्मशेषापेक्षा वा न ज्ञानस्योप-
पद्यते। ततोऽसदेव सूक्तवाकानु-
मन्त्रणवद्यथायोगं विभाग इति ।
[दक्षिण भाग / हिन्दी व्याख्या]
आत्मज्ञानके साधन हैं—इस प्रकार
अर्थके सम्बन्धकी उपपत्ति के
सामर्थ्यसे उनका ऐसा विभाग
उचित ही है। ऐसा मानें तो ?
समाधान—युक्तिसङ्गत न होनेके
कारण ऐसा मानना ठीक नहीं,
क्योंकि ऐसा विभाग प्रस्तुत प्रसंगके
अनुकूल नहीं है। सब प्रकारकी
क्रिया कारक फल और भेदबुद्धिका
तिरस्कार करनेवाली ब्रह्मविद्यामें
किसी प्रकारके शेषकी अपेक्षा अथवा
उचित सहकारी साधनका सम्बन्ध
मानना ठीक नहीं है, क्योंकि ब्रह्मविद्या
और उसका फल निःश्रेयस—ये सब
प्रकारके विषयोंसे निवृत्त होकर
प्रत्यगात्मा-रूप विषयमें स्थित
होनेवाले हैं। [कहा भी है]
“मोक्षकी इच्छा करनेवाला पुरुष
सर्वदा साधनसहित कर्मोंको त्याग
दे। त्याग करनेसे ही त्यागीको
अपने प्रत्यगात्मरूप परमपदका
ज्ञान हो सकता है”। अतः कर्मको
ज्ञानकी सहकारिता अथवा ज्ञानको
कर्मका शेष होनेकी अपेक्षा सम्भव
नहीं है। अतः सूक्तवाकरूप
अनुमन्त्रणके समान इन तप आदिका
भी सम्बन्धके अनुसार विभाग हो
सकता है—ऐसा विचार मिथ्या ही
है। अतः [शिष्यके उपर्युक्त]