केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 128 of 152
Read in context१२० केनोपनिषद् [ खण्ड ४
पद-भाष्य
तस्माद्वै इन्द्रः अतितरामिव अतिशेरत इव अन्यान् देवान् । स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श यस्मात् स ह्येनत्प्रथमो विदांचकार ब्रह्मेत्युक्तार्थं वाक्यम् ॥ ३ ॥
अतः इन्द्र इन अन्य देवताओंकी अपेक्षा भी बढ़कर हुआ, क्योंकि उसीने इसे सबसे समीपसे स्पर्श किया था—उसीने इसे सबसे पहले जाना था कि ‘यह ब्रह्म है’ इस प्रकार इस वाक्यका अर्थ पहले ही कहा जा चुका है ॥ ३ ॥
ब्रह्मविषयक अधिदेव आदेश
तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतो व्यद्युतदा ३ इती-
न्यमीमिषदा३ इत्यधिदैवतम् ॥ ४ ॥
उस ब्रह्मका यह [उपासना-सम्बन्धी] आदेश है। जो बिजलीके चमकनेके समान तथा पलक मारनेके समान प्रादुर्भूत हुआ वह उस ब्रह्मका अधिदैवत रूप है ॥ ४ ॥
पद-भाष्य
तस्य प्रकृतस्य ब्रह्मण एष आदेश उपमोपदेशः। निरुपमस्य ब्रह्मणो येनोपमानेनोपदेशः
उस प्रस्तावित ब्रह्मके विषयमें यह आदेश यानी उपमोपदेश है। जिस उपमासे उस निरुपम ब्रह्मका उपदेश किया जाता है वह
वाक्य-भाष्य
तस्यैष आदेशः । तस्य ब्रह्मण एष वक्ष्यमाण आदेश उपासनोपदेश इत्यर्थः । यस्माद्देवेभ्यो
उसका यह आदेश है। अर्थात् उस ब्रह्मका यह आगे कहा जानेवाला आदेश—उपासनासम्बन्धी उपदेश है। क्योंकि ब्रह्म देवताओंके सामने विद्युत्-