कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र ० १ : अ ० ३ ] वार्तादण्डनीतिस्थापना १३
(१) दुष्प्रणीतः कामक्रोधाभ्यामज्ञानाद्वानप्रस्थपरिव्राजकानपि कोपयति, किमङ्ग पुनर्गृहस्थान् । अप्रणीतो हि मात्स्यन्यायमुद्भावयति । बलीयानबलं हि ग्रसते दण्डधराभावे । तेन गुप्तः प्रभवतीति ।
(२) चतुर्वर्णाश्रमो लोको राज्ञा दण्डेन पालितः ।
स्वधर्मकर्माभिरतो वर्तते स्वेषु वेश्मसु ॥
इति कौटीलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे विद्यासमुद्देशे वार्त्तास्थापना दण्डनीतिस्थापना च तृतीयोऽध्यायः ।
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हैं; किन्तु दण्ड में ढिलाई कर देने से भी लोक, राजा की अवहेलना करने लगता है । इसलिए राजा को समुचित दण्ड देने वाला होना चाहिए ।'
( १ ) भली भाँति सोच-समझ कर प्रयुक्त दण्ड प्रजा को धर्म, अर्थ और काम में प्रवृत्त करता है । काम-क्रोध के वशीभूत होकर अज्ञानतापूर्वक अनुचित रीति से प्रयुक्त किया हुआ दण्ड, वानप्रस्थ और परिव्राजक जैसे निःस्पृह व्यक्तियों को भी कुपित कर देता है; फिर गृहस्थलोगों पर ऐसे दण्ड की क्या प्रतिक्रिया होगी, सोचा ही नहीं जा सकता है ! इसके विपरीत, यदि दण्ड से व्यवस्था सर्वथा ही तोड़ दी जाय तो उसका कुप्रभाव यह होगा कि जैसे छोटी मछली को बड़ी मछली खा जाती है, वैसे ही बलवान् व्यक्ति, निर्बल व्यक्ति का रहना दूभर कर देगा । दण्ड-व्यवस्था के अभाव में सर्वत्र ही अराजकता फैल जाती है और निर्बल को बलवान् सताने लगता है; किन्तु दण्डधारी राजा से रक्षित दुर्बल भी बलवान् बना रहता है ।
(२) राजाकी दण्ड-व्यवस्था से रक्षित चारों वर्ण-आश्रम, सारा लोक, अपने-अपने धर्मकर्मों में प्रवृत्त होकर निरन्तर अपनी-अपनी मर्यादा पर बने रहते हैं ।
विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में तीसरा अध्याय समाप्त ।
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