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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 807 of 918

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Page 807

प्र० १७४-१७५ : अ० ४ ] दुर्ग को अधिकार में करना ७२३

मृतुश्च पुरस्तात्, अपर्तुः परस्य व्याधिदुर्भिक्षनिचयरक्षाक्षयः क्रीतबलनिर्वेदो मित्रबलनिर्वेदश्च' इति पर्युपासीत ।

(१) कृत्वा स्कन्धावारस्य रक्षां वीवधासारयोः पथश्च, परिक्षिप्य दुर्गं खातसालाभ्यां, दूषयित्वोदकमवस्त्राव्य परिखाः सम्पूरयित्वा वा, सुरुङ्गा-बलकुटिकाभ्यां वप्रप्राकारौ हारयेत् ।

(२) द्वारं च गुलेन निम्नं वा पांसुमाल्याऽऽच्छादयेत् । बहुलारक्षं यन्त्रैर्घातयेत् । निष्करादुपनिष्कृष्याश्वैश्च प्रहरेयुः । विक्रमान्तरेषु च नियोग-विकल्पसमुच्चयैश्चोपायानां सिद्धिं लिप्सेत । दुर्गवासिनः ।

(३) श्येनकाकनप्तृभासशुकशारिकोलूककपोतान् ग्राहयित्वा पुच्छेष्व-ग्नियोगयुक्तान् परदुर्गे विसृजेयुः ।

वस्त्र, मशीन, हथियार, कवच, श्रमिक और रस्सी आदि सभी उपयोगी सामग्री से अपनी सेना युक्त है और ऋतु भी अपने अनुकूल है; किन्तु शत्रु का देश बीमारी, दुर्भिक्ष से अभिभूत, धन-धान्य तथा रक्षक पुरुषों से अभावग्रस्त है, उसको वेतनभोगी सेना सहायता देने से इनकार करती हो, मित्रसेना भी खिन्न हो चुकी हो और ऋतु भी उसके प्रतिकूल हो, ऐसी अवस्था में यह शत्रु के दुर्ग पर घेरा डाल दे ।

(१) शत्रु-दुर्ग पर घेरा डालने के लिए विजिगीषु को चाहिए कि पहिले वह अपनी छावनी, वीवध, असार और अपने मार्ग की रक्षा करे, फिर खाई तथा पर-कोटे के अनुसार दुर्ग को चारों ओर से घेरा डाल दे, तदनन्तर शत्रु के पानी में विष मिला दे या बाँध तोड़ कर उसे बहा दे, और अन्त में खाइयों को मिट्टी से पाट कर या किले की दीवारों तथा अटारियों पर सुरंग बनाकर दुर्ग पर आक्रमण कर दे ।

(२) दुर्ग की दरारों को कंकरीट से तथा नीची-गहरी जगहों को मिट्टी से पाट दिया जाय । दुर्ग के जिस भाग में रक्षा का अधिक प्रबन्ध हो उसे मशीनों द्वारा नष्ट कर दिया जाय । कपट से रक्षक पुरुषों को बाहर निकाल कर घोड़ों तथा हाथियों द्वारा उन पर हमला बोल दिया जाय । जब युद्धक्षेत्र में शत्रु की सेना अधिक पराक्रम-शाली जान पड़े तो साम, दान आदि उपायों के द्वारा या अवसर के अनुसार वैसा ही उपाय का प्रयोग करे या एक उपाय की जगह दूसरे उपाय को काम में लाकर अथवा अनेक उपायों को एक साथ उपयोग में लाकर दुर्गवासी शत्रु पर विजय-लाभ की चेष्टा करनी चाहिए ।

(३) बाज, कौवा, नप्ता (मुर्ग के समान); गिद्ध, तोता, मैना, उल्लू और कबूतर आदि पक्षियों को पकड़ कर उनकी पूँछ में आग लगाने वाली औषधियों को मल कर उन्हें शत्रु के दुर्ग में छोड़ दिया जाय, जिससे कि वहाँ आग लग जाय ।