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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 805 of 918

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Page 805

प्र० १७३ : अ० ३ ] अपसर्पप्रणिधि ७२१

प्रहवणकर्मणा मदनरसयोगाभ्यामतिसन्दध्यात् । अथावस्कन्दं दद्यात् । शौण्डिकव्यञ्जनो वा दैवतप्रेतकार्योत्सवसमाजेष्वाटविकान् सुराविक्रयोपायननिमित्तं मदनरसयोगाभ्यामतिसन्दध्यात् । अथावस्कन्दं दद्यात् ।
(१) ग्रामघातप्रविष्टां वा विक्षिप्य बहुधाऽटवीम् ।
घातयेदिति चोराणामपसर्पाः प्रकीर्तिताः ॥

इति दुर्गलम्भोपाये त्रयोदशेऽधिकरणे अपसर्पप्रणिधिर्नाम तृतीयोऽध्यायः; आदितो द्विचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।

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उन आठविकों को गिरफ्तार कर ले, अथवा संकर्षण देवता के मानने वाले (मदिराप्रियों) मुण्डित तथा जटाधारियों के वेष में रहने वाले गुप्तचर उत्सव या सहभोज आदि के बहाने विष देकर या दूसरे तरीकों से उन आठविकों को अपने वश में कर लें, उसके बाद जब वे बेहोश हो जायँ तो उन्हें गिरफ्तार कर लें, अथवा शराब विक्रेताओं के वेष में रहने वाले गुप्तचर किसी देवकार्य, प्रेतकार्य, उत्सव तथा अन्य सामाजिक भोजों के अवसर पर अपनी विक्रयार्थ शराब में विषैले रसों का प्रयोग कर आठविकों को अपने वश में करें और जब वे बेहोश हो जायँ तो उन्हें गिरफ्तार कर लें ।

( १ ) गाँव को नष्ट करने की नियत से गाँव में प्रविष्ट हुए आठविकों के हृदय में विभिन्न प्रकार के विकार उत्पन्न कर उन्हें नष्ट कर दिया जाय । यहाँ तक आठविकों ( चोरों ) के सम्बन्ध में गुप्तचरों के कार्यों का निरूपण किया गया ।

दुर्गलम्भोपाय नामक तेरहवें अधिकरण में अपसर्पप्रणिधि नामक तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ।

—: ० :—

४६ कौ०