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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 798 of 918

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Page 798

७१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण

चाटूक्तचांदिषु कृत्येषु यज्ञप्रहवणेषु वा ।
सूतिकाप्रेतरोगेषु प्रीतिशोकभयेषु वा ॥
प्रमादं याति यस्मिन्वा विश्वासात्स्वजनोत्सवे ।
यत्रास्यारक्षिसञ्चारो दुर्दिने सङ्कुलेषु वा ॥
विप्रस्थाने प्रदीप्ते वा प्रविष्टे निर्जनेऽपि वा ।
वस्त्राभरणमाल्यानां फेलाभिः शयनासनैः ॥
मद्यभोजनफेलाभिस्तूर्यैर्वाभिहतैः सह ।
प्रहरेयुररींस्तीक्ष्णाः पूर्वप्रणिहितैः सह ॥
(१) यथैव प्रविशेयुश्च द्विषतः सत्रहेतुभिः ।
तथैव चापगच्छेयुरित्युक्तं योगवामनम् ॥
इति दुर्गलम्भोपाये त्रयोदशेऽधिकरणे योगवामनं नाम द्वितीयोऽध्यायः;
आदित एकचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।

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पर धिक्कार के योग्य कार्य करता हो, या यज्ञ, उत्सव, सूतिका, मृत्यु, रोग, प्रीति, शोक, भय आदि में प्रसन्न, दुःखी और भयभीत होता हो; अथवा जब किसी सगे-संबंधी के यहाँ उत्सव में सम्मिलित होकर प्रमत्त हो जाता हो, अथवा जहाँ रक्षित पुरुषों के बिना ही जाता-आता हो, अथवा किसी दुर्दिन या भीड़-भिड़ाके के अवसरों पर, अथवा निर्जन स्थान में, अथवा नगर में आग लग जाने पर, या नीरव घने जंगल में शत्रु के प्रविष्ट हो जाने पर—ऐसी स्थितियों में पहिले ही से छिपे हुए गुप्तचर, ज्यों ही इशारे के लिए वस्त्र, आभरण, माला, शयन, आसन, मद्य, भोजन आदि अवसरों पर तूर्यघोष हो, वैसे ही वे धावा बोल दें ।

( १ ) जिस प्रकार सत्री आदि गुप्तचर शत्रुओं के बीच में प्रविष्ट हुए हों, उसी छल से वे बाहर निकल आवें, अन्यथा उनके पकड़े जाने की संभावना हो सकती है । यहाँ तक योगवामन ( कपट उपायों द्वारा राजा को लुभाना ) का निरूपण किया गया ।

दुर्गलम्भोपाय नामक तेरहवें अधिकरण में योगवामन नामक दूसरा अध्याय समाप्त

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