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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 789 of 918

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Page 789
प्रकरण १७१उपजापः
अध्याय १

(१) विजिगीषु परग्राममवाप्तुकामः सर्वज्ञदैवतसंयोगख्यापनाभ्यां स्वपक्षमुद्धर्षयेत्, परपक्षं चोद्वेजयेत् ।
(२) सर्वज्ञख्यापनं तु-गृहगुह्यप्रवृत्तिज्ञानेन प्रत्यादेशो मुख्यानां, कण्टक-शोधनापसर्पागमेन प्रकाशनं राजद्विष्टकारिणां, विज्ञाप्योपायनख्यापनम-दृष्टसंसर्गविद्यासंज्ञादिभिः, विदेशप्रवृत्तिज्ञानं तदहरेव गृहकपोतेन मुद्रा-संयुक्तेन ।
(३) दैवतसंयोगख्यापनं तु-सुरुङ्गामुखेनाग्निचैत्यदैवतप्रतिमाच्छिद्रानु-प्रविष्टैरग्निचैत्यदैवतव्यञ्जनैः सम्भाषणं पूजनं च, उदकादुत्थितैर्वा नाग-वरुणव्यञ्जनैः सम्भाषा पूजनं च, रात्रावन्तरुदके समुद्रवालुकाकोशं प्रणि-


उपजाप

(१) यदि विजिगीषु राजा अपने शत्रु के गाँव या शहर पर अधिकार करने का इच्छुक हो तो उसे चाहिए कि वह स्वयं को सर्वज्ञ तथा देवता का साक्षात्कार करने वाला प्रसिद्ध करके अपने पक्ष को उत्साहित करे और शत्रुपक्ष में बेचैनी फैला दे ।

(२) सर्वज्ञता की प्रसिद्धि के तरीके : अपनी सर्वज्ञता का प्रचार-प्रसार करने के लिये विजिगीषु को चाहिए कि वह अपने गुप्तचरों द्वारा, प्रमुख व्यक्तियों के घरों में छिपे तौर पर होने वाले बुरे कार्यों का पता लगाकर, उन प्रमुख व्यक्तियों को ऐसे कार्य करने से वर्जित करे । कण्टक शोधन अधिकरण में निर्दिष्ट अपसर्पोपदेश के द्वारा अपने शत्रुओं के गुप्त-भेदों को जानकर उन्हें उनके सामने प्रकट करे और ऐसा करने से उन लोगों को रोके । दूसरे लोगों से अज्ञात संसर्ग विद्या (नाचना, गाना) के संकेतों द्वारा अथवा गुप्तचरों से पता लगाकर राजा के लिए भेंटस्वरूप आने वाली वस्तुओं को वह पहिले ही बतला दे । विदेश में घटित होने वाली घटना को वह मुद्रायुक्त कपोत के द्वारा अपने घर पर बैठा ही बतला दे ।

(३) दैवसाक्षात्कार की प्रसिद्धि के तरीके : अपने दैव-साक्षात्कार के प्रचार-प्रसार के लिए विजिगीषु को चाहिए कि सुरंग के द्वारा आग के बीच में तथा देवताओं की पोली प्रतिमाओं के बीच में और समाधि (चैत्य) के बीच में गुप्तचरों को भेजकर राजा उनसे बातचीत करे एवं उनका पूजन करे; अथवा पानी से निकले

४५ कौ०