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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 783 of 918

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Page 783

प्र० : १६८-१७० अ० ५ ] योग-दण्डादि द्वारा विजय ६९९

(१) जनपदमेकस्थं वा घातयितुममित्रानीकमावाहयेत्; तदवरुद्धदेशमतिनीय विश्वस्तं घातयेत् ।

(२) मित्रव्यञ्जनो वा बाह्यस्य प्रेषयेत्—‘क्षीणमस्मिन्दु दुर्गे धान्यं स्नेहाः क्षारो लवणं वा; तदमुष्मिन्देशे काले च प्रवेक्ष्यति, तदुपगृहाण’ इति । ततो रसविद्धं धान्यं स्नेहं क्षारं लवणं वा दूष्यामित्राटविकाः प्रवेशयेयुः, अन्ये वा अभित्यक्ताः ।

(३) तेन सर्वभाण्डवीवधग्रहणं व्याख्यातम् ।

(४) सन्धि वा कृत्वा हिरण्यैकदेशमस्मै दद्यात् । विलम्बमानः शेषम् । ततो रक्षाविधानान्यपस्रावयेत्, अग्निरसशस्त्रैर्वा प्रहरेत्, हिरण्यप्रतिग्राहिणो वास्य वल्लभाननुगृह्णीयात् ।

(५) परिक्षीणो वास्मै दुर्गं दत्त्वा निर्गच्छेत्सुरुङ्गया । कुक्षिप्रदरेण वा प्राकारभेदेन निर्गच्छेत् ।


सेना के कुछ भाग को ऐसी जगह ले जाय, जहां से उसका लौटना असम्भव हो और विश्वासघात कर उसे वहीं मरवा डाले ।

( १ ) अथवा किसी एकत्र हुए उच्छृङ्खल जनपद को काबू में करने के लिए अन्तपाल शत्रुसेना को बुलाये और उसके बाद उस सेना को ऐसे देश में ले जाय, जहाँ से वह वापस न लौट सके; वहाँ ले जाकर उसको मरवा डाले ।

( २ ) अथवा मित्र के वेष में रहने वाले सभी गुप्तचर शत्रुराजा के पास इस प्रकार का सन्देश भिजवायें : शत्रु के इस दुर्ग में अन्न, घी, तेल, गुड़ तथा नमक आदि सब पदार्थ समाप्त हो चुके हैं । यह सब सामान अमुक स्थान से अमुक समय में ले जाया जायेगा । तुम उसको रास्ते में ही लूट लेना ।' तदनन्तर विजिगीषु के दूष्य, शत्रु तथा आटविक विषमिश्रित उक्त सामान को उसी समय उन्हीं मार्गों से लेकर गुजरें अथवा दूसरे वध्य पुरुष उस सामान को ले जायँ ।

( ३ ) इसी प्रकार दूसरे विषयुक्त खाद्यपदार्थों को शत्रु राजा तक पहुँचाने के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए ।

( ४ ) अथवा दुर्बल राजा, शत्रु राजा के साथ सन्धि करके प्रतिज्ञात धन का कुछ हिस्सा तत्काल ही उसे दे दे और शेष भाग को विलम्ब से देने का वादा कर, उसे भी ठीक समय पर अदा कर दे । इस प्रकार जब शत्रु का उस पर विश्वास हो जाय तो अपनी रक्षा के लिए चारों ओर तैनात शत्रुसेना को वह हटा ले और स्वतन्त्र होकर विष, अग्नि तथा शस्त्रों द्वारा शत्रु पर प्रहार करे; अथवा काबू में आने वाले शत्रु के अवरुद्ध बन्धु-बांधवों को धन देकर उन्हीं के द्वारा शत्रु को मरवा दे ।

( ५ ) अथवा यदि दुर्बल राजा शत्रु का प्रतीकार करने में सर्वथा असमर्थ हो तो