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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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( आपस्तंब-धर्मसूत्र २, ५, १०, १४ ) । गृह्यसूत्र में तो आदित्य नामक एक अर्थशास्त्रविद् आचार्य का उल्लेख तक मिलता है ( आश्वलायन गृह्यसूत्र ३, १३, १६ )। महाभारत में हिन्दू राजनीतिशास्त्र का सिलसिलेवार इतिहास मिलता है और इस परंपरा के कतिपय प्राचीन आचार्यों की सूची भी उसमें उल्लिखित है ( महाभारत, शान्तिपर्व, अध्याय ५८, ५९ )।

अर्थशास्त्र की प्राचीन परम्परा का अध्ययन करते समय इस सम्बन्ध में एक बात जानने योग्य यह है कि आरम्भ में दण्डनीति और शासन-सम्बन्धी कार्यों का उल्लेख भी अर्थशास्त्र के लिए ही होता था, किन्तु कौटिल्य के बाद अर्थशास्त्र से केवल जनपद-सम्बन्धी कार्यों का ही विधान होने लगा था । अर्थ की व्याख्या करते हुए कौटिल्य ने लिखा है कि 'अर्थ का अभिप्राय है मनुष्यों की बस्ती, अर्थात् वह प्रदेश जिसमें मनुष्य बसते हों । अर्थशास्त्र उस शास्त्र को कहते हैं, जिसमें राज्य की प्राप्ति और उसके पालन के उपायों का वर्णन हो ।' ( अर्थशास्त्र, पृ० ७६५ ) । आचार्य उषण के राजनीतिशास्त्र-विषयक ग्रन्थ को दण्डनीतिशास्त्र ( विशाखदत्त : मुद्राराक्षस १।७ ) और आचार्य बृहस्पति के ग्रन्थ को अर्थशास्त्र ( वात्स्यायन : कामसूत्र १ ) इसी लिए कहा जाने लगा था । इसी परम्परा के अनुसार महाभारतकार ने भी प्रजापति के ग्रन्थ को राजशास्त्र कहकर स्मरण किया है (महाभारत, शांतिपर्व, अ०५९) । इसी प्रकार कौटिल्य के अर्थशास्त्र में जो ग्रन्थकार ऐतिहासिक व्यक्ति माने गये हैं, वे शांतिपर्व में देवी-विभूति तथा पौराणिक रूप में स्मरण किये गये हैं ( जायसवाल : हिन्दू-राजतन्त्र १, पृ० ६ का फुटनोट ) ।

समस्त पूर्ववर्ती आचार्य-परंपरा के सिद्धान्तों और उनकी वे कृतियाँ, जो कि सम्प्रति अनुपलब्ध हैं, उन सब का एक साथ निष्कर्ष हम कौटिल्य के अर्थशास्त्र में पाते हैं। कौटिल्य ने अपने पूर्ववर्ती लगभग अठारह-उन्नीस अर्थ-शास्त्रविद् आचार्यों का उल्लेख किया है; जिनसे विचार ग्रहण कर उन्होंने अपने अद्भुत ग्रन्थ का निर्माण किया। इस प्राचीन आचार्य-परंपरा के परिचय से ऐसा प्रतीत होता है कि अर्थशास्त्र का निर्माण बहुत पहले से होने लगा था और विभिन्न ग्रन्थों में आदर के साथ उल्लेख किया जाने लगा था, जिसकी व्यापक व्याख्या हम कौटिल्य के अर्थशास्त्र में पाते हैं।

ई० पूर्व ४०० के अनन्तर और ४०० के बीच में रचे गये धर्मशास्त्र-विषयक ग्रन्थों में सर्वत्र ही हमें अर्थशास्त्र की विस्तृत चर्चाएँ और प्राचीन अर्थशास्त्रियों के सिद्धान्तों का उल्लेख देखने को मिलता है। किन्तु ये सभी चर्चाएँ बिखरी हालत में उपलब्ध होती हैं। आचार्य कामन्दक ने ४०० ई० के लगभग एक