कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| प्रकरण १५०-१५२ | कूटयुद्धविकल्पाः, स्वसैन्योत्साहनं, स्वबलान्यबलव्यायोगश्च |
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| अध्याय ३ |
(१) बलविशिष्टः कृतोपजापः प्रतिविहितर्तुः स्वभूम्यां प्रकाशयुद्धमुपेयात् विपर्यये कूटयुद्धम् ।
(२) बलव्यसनावस्कन्दकालेषु परमभिहन्यात् । अभूमिष्ठं वा स्वभूमिष्ठः । प्रकृतिप्रग्रहो वा स्वभूमिष्ठं दूष्यामित्र्राटवीबलैर्वा भङ्गं दत्त्वा विभूमिप्राप्तं हन्यात् । संहतानीकं हस्तिभिर्भेदयेत् ।
(३) पूर्वं भङ्गप्रदानेनानुप्रलीनं भिन्नमभिन्नं प्रतिनिवृत्य हन्यात् । पुरस्तादभिहत्य प्रचलं विमुखं वा पृष्ठतो हस्त्यश्वेनाभिहन्यात् । पृष्ठतोऽभिहत्य प्रचलं विमुखं वा पुरस्तात्सारबलेनाभिहन्यात् ।
कूटयुद्ध के भेद, अपनी सेना का प्रोत्साहन और अपनी तथा पराई सेना का प्रयोग
( १ ) बलवान् एवं बृहद् सेना से युक्त, शत्रुपक्ष को फोड़ने में समर्थ और युद्ध योग्य समय को अपने अनुकूल बनाने वाले विजिगीषु को चाहिए कि वह अपनी अनुकूल भूमि में ही प्रकाश-युद्ध करना स्वीकार करे । यदि इसके विपरीत व्यवस्था हो तो कूटयुद्ध ही करना चाहिए ।
( २ ) व्यसनापन्न सेना पर या लम्बे सफर, जंगल के सफर अथवा जलाभाव की अवस्था में शत्रु के ऊपर आक्रमण किया जाय । अथवा शत्रु की विरुद्ध स्थिति और अपनी अनुकूल स्थिति होने पर आक्रमण करे । अथवा शत्रु की अमात्य आदि प्रकृतियों को वश में करके तब आक्रमण किया जाय अथवा राजद्रोहियों, शत्रुओं और जांगलिकों को अपनी पराजय का विश्वास दिलाकर जब वे अपना स्थान छोड़ दें तब उन पर आक्रमण किया जाय । अनुकूल भूमि में एक स्थान पर ठहरी हुई शत्रु-सेना को हाथियों द्वारा छिन्न-भिन्न किया जाय ।
( ३ ) पूर्व पराजय के कारण तितर-बितर हुई शत्रु की सेना को विजिगीषु की एकत्र सेना लौट कर फिर मारे । सामने की ओर से आक्रमण करने के कारण तितर-बितर अथवा भागी हुई शत्रु सेना को पीछे की ओर से घुड़सवारों और हाथियों के द्वारा नष्ट करा दिया जाय । पीछे की ओर से आक्रमण करने के कारण छिन्न-भिन्न या उलटी भागी हुई शत्रु सेना को सामने की ओर से बहादुर सैनिकों के द्वारा नष्ट-भ्रष्ट करा दिया जाय ।