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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 722 of 918

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Page 722

६३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवाँ अधिकरण

सालपरिक्षेपाः प्रथमे पुरस्तान्मन्त्रिपुरोहितौ, दक्षिणतः कोष्ठागारं महानसं च, वामतः कुप्यायुधागारम्, द्वितीये मौलभृतानां स्थानम्, अश्वरथानां, सेनापतेश्च। तृतीये हस्तिनः श्रेण्यः प्रशास्ता च। चतुर्थे विष्टिनायको मित्रामित्राटवीबलं स्वपुरुषाधिष्ठितम्। वणिजो रूपाजीवाश्चानुमहापथम्। बाह्यतो लुब्धकश्वगणिनः सत्यग्नयो गूढाश्चारक्षाः।
(१) शत्रूणामापाते कूपकूटावपातकण्टकिनीश्च स्थापयेत्। अष्टादशवर्गाणारक्षविपर्यासं कारयेत्। दिवायामं च कारयेदपसर्पज्ञानार्थम्।
(२) विवादसौरिकसमाजद्यूतवारणं च कारयेत्। मुद्रारक्षणं च। सेनानिवृत्तमायुधीयमशासनं शून्यपालोऽनुबध्नीयात्।

लकड़ी के खंभों की और चौड़ी बाड़ मजबूत चहार-दीवारी के ढंग की होनी चाहिए। प्रत्येक बाड़ का फासला सौ-सौ धनुष का होना चाहिए। पहली बाड़ के बीच में सामने की ओर मंत्रियों और पुरोहितों के स्थान बनवाने चाहिए। दाहिनी ओर भोजन-भंडार और रसोईघर होने चाहिए। बाँई ओर लोहा, ताँबा, लकड़ी आदि रखने की जगह और आयुधागार होने चाहिए। दूसरी बाड़ के बीच में मौलभृत आदि सेनाओं के स्थान और घोड़ों तथा सेनापति के स्थान होने चाहिए। इसी प्रकार बाड़ के तीसरे-घेरे में हाथियों, श्रेणीबल तथा प्रशास्ता (कंटकशोधन का अध्यक्ष) के स्थान होने चाहिए। बाड़ के चौथे घेरे में कर्मचारीवर्ग (विष्ट), नायक (दस सेनापतियों का प्रधान) और अपने विश्वस्त अधिकारी से संरक्षित मित्रसेना शत्रुसेना तथा आटविकसेना के स्थान बनवाये जाँय। व्यापारी और वेश्याओं के स्थान, बड़े बाजार (महापथ) में बनवाये जाँय। बहेलिये, शिकारी, बाजे तथा अग्नि आदि के इशारे से शत्रु के आगमन की सूचना देने वाले और ग्वाले आदि के वेष में रहने वाले रक्षकों को सबसे बाहर की ओर बसाया जाय।

(१) जिस मार्ग के शत्रु के आने की संभावना हो वहाँ कुएँ, गढे आदि खोदकर और लोहे की कीलों या काँटों से युक्त तख्तों को बिछाकर शत्रु को रोकने का प्रबन्ध किया जाय। हर समय पहरे के लिए अठारह वर्गों को बारी-बारी से नियुक्त किया जाय। शत्रु के गुप्तचरों का पता लगाने के लिए दिन-रात अपने आदमियों को घूमने के लिए नियुक्त करना चाहिए।

(२) आपसी झगड़ों, मदिरापान और जुआ आदि खेलने से सैनिकों को सर्वथा रोक लिया जाय। छावनी के भीतर-बाहर जाने-आने के लिए राजकीय मुहर का पास बनाया जाय। राजा की लिखित आज्ञापत्र के बिना युद्धभूमि से लौटने वाले सैनिकों को, शून्यपाल (राजधानी का रक्षण-अधिकारी) गिरफ्तार कर ले।