कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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(१) क्षयस्थानवृद्धीनां चोत्तरोत्तरं लिप्सोत । प्रातिलोम्येन वा क्षयादीनाम् । आयत्यां विशेषं पश्येत् ।
(२) इति देशावस्थापनम् ।
(३) एतेन यात्रादिमध्यान्तेष्वर्थानर्थसंशयानामुपसंप्राप्तिर्व्याख्याता ।
(४) निरन्तरयोगित्वाच्चार्थानर्थसंशयानां यात्रादावर्थः श्रेयानुपसंप्राप्तुं पाष्णिग्राहासारप्रतिघाते क्षयव्ययप्रवासप्रत्यादेयमूलरक्षणेषु च भवति । तथानर्थः संशयो वा स्वभूमिष्ठस्य विषह्यो भवति ।
(५) एतेन यात्रामध्येऽर्थानर्थसंशयानामुपसम्प्राप्तिर्व्याख्याता ।
(६) यात्रान्ते तु कर्शनीयमुच्छेदनीयं वा कर्शयित्वोच्छिद्य वार्थः श्रेयानुपसम्प्राप्तुं नानर्थः संशयो वा पराबाधभयात् ।
(७) सामवायिकानामपुरोगस्य तु यात्रामध्यान्तगोऽनर्थः संशयो वा श्रेयानुपसंप्राप्तुमनिबन्धगामित्वात् ।
( १ ) क्षय ( शक्ति और सिद्धि की क्षीणता ), स्थान ( शक्ति और सिद्धि की एकावस्था ) और वृद्धि ( शक्ति और सिद्धि का उपचय ), इनमें से उत्तरोत्तर को प्राप्त करने का यत्न करना चाहिए । अथवा यदि भविष्य में किसी वृद्धि की अतिशय संभावना हो तो वृद्धि से स्थान और स्थान से क्षय, इस प्रतिलोम गति से ही उसे प्राप्त करने का यत्न करना चाहिए ।
( २ ) यहाँ तक देश-निमित्तक आपत्तियों का निरूपण किया गया ।
( ३ ) देशनिमित्तक आपत्तियों के स्वरूप और प्रतीकार के समान ही युद्धयात्रा के आदि, अन्त तथा मध्य में होने वाले अर्थ, अनर्थ और संशयों की प्राप्ति तथा प्रतीकार का भी निरूपण समझना चाहिए ।
( ४ ) यदि युद्धयात्रा के आदि में अर्थ, अनर्थ और संशय एक साथ ही उत्पन्न हो जायें तो उनमें से पहिले अर्थग्रहण करना ही श्रेयस्कर होता है । पाष्णिग्राह तथा आसार के प्रतिघात के लिए और क्षय, व्यय, प्रवास, प्रत्यादेय तथा मूल स्थान इन सबकी रक्षा के लिए अर्थ ही मूल कारण होता है : यदि युद्ध यात्रा के आरम्भ में अर्थ के समान ही अनर्थ और संशय भी उपस्थित हों तो अपनी भूमि में स्थित राजा उनका प्रतीकार सरलता से कर सकता है ।
( ५ ) इसी प्रकार युद्धयात्रा के मध्य में उत्पन्न अर्थ, अनर्थ और संशय की प्राप्ति तथा प्रतीकार का व्याख्यान भी समझ लेना चाहिए ।
( ६ ) यात्रा के अन्त में, परभूमि में स्थित विजिगीषु के लिए निर्बल एवं उच्छेदनीय शत्रु का ही अर्थग्रहण करना श्रेष्ठ है । ऐसी स्थिति में अनर्थ या संशय का ग्रहण करना उचित नहीं है, क्योंकि ऐसे समय शत्रु की ओर से बाधा पहुँचने की पूरी सम्भावना बनी रहती है ।
( ७ ) यदि राजमंडल के किसी अप्रधान राजा पर आक्रमण किया जाय तो उस