कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| ६१६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ नौवां अधिकरण |
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तदस्याख्यातव्यम्' इति । परस्पराद्वा भेदयेदेनान्—असौ चासौ च वो राजन्येवमुपजपति । इति भेदः ।
(१) दाण्डकर्मिकवच्च दण्डः ।
(२) एतासां चतसृणामापदामभ्यन्तरामेव पूर्वं साधयेत् । 'अहिभयादभ्यन्तरकोपो बाह्यकोपात्पापीयान्' इत्युक्तं पुरस्तात् ।
(३) पूर्वां पूर्वा विजानीयाल्लघ्वीमापदमापदाम् ।
उत्थितां बलवद्भूचो वा गुर्वी लघ्वीं विपर्यये ॥
इति अभियास्यत्कर्मणि नवमेऽधिकरणे बाह्याभ्यन्तराश्चापदो नाम पञ्चमोऽध्यायः; आदितः पञ्चविंशत्युत्तरशततमः ।
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लेगा । इसलिए तुम्हें अपने मन की बात सच-सच कह देनी चाहिए ।' इस प्रकार कह देने से वे डर जायेंगे । अथवा उनकी आपस में यह कहकर कि 'अमुक-अमुक व्यक्ति राजा से तुम्हारी शिकायत कर रहा था' फूट डलवा दे ।
(१) ऐसे प्रसङ्गों में दाण्डकर्मिक प्रकरण में निर्दिष्ट उपांशुदण्ड का प्रयोग करना चाहिए ।
(२) उक्त चारों प्रकार की आपत्तियों में सर्वप्रथम आभ्यन्तर आपत्ति का प्रतीकार करना चाहिए; क्योंकि वह अधिक अनर्थकारी होती है । पहले भी इस बात का संकेत किया जा चुका है कि बाह्यकोप की अपेक्षा आभ्यन्तर कोप घर के साँप की तरह अधिक भयानक होता है ।
(३) पूर्वोक्त आपत्तियों में क्रमशः पूर्व-पूर्व की आपत्ति अपेक्षया लघु होती है; फिर भी जिस आपत्ति के पीछे बलवान् का हाथ हो उसका प्रतीकार पहिले करना चाहिए और इसी प्रकार निर्बल शत्रु के द्वारा पैदा की गयी सबसे बड़ी आपत्ति को लघु ही समझना चाहिए ।
अभियास्यत्कर्म नामक नौवें अधिकरण में बाह्याभ्यन्तरापद नामक पाँचवां अध्याय समाप्त ।
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