कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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के आरंभिक अंश में हमें चार बातों की जानकारी होती है। पहली बात तो यह कि कौटिल्य ने अर्थशास्त्र की रचना की, दूसरी बात यह कि कामन्दक के नीति-ग्रंथ का आधारभूत वही अर्थशास्त्र था, तीसरी बात यह कि कौटिल्य ने नन्द-वंश का उन्मूलन कर उसकी जगह मौर्य-वंश को प्रतिष्ठित किया और चौथी बात यह कि कौटिल्य का असली नाम विष्णुगुप्त था। नीतिसार का सारांश इस प्रकार है :
नीतिसार उसी विद्वान् के ग्रन्थ का आधार है, जिसके वज्र ने पर्वत की तरह अविचल, अडिग नन्द-वंश को उखाड़ फेंका था, जिसने चन्द्रगुप्त को पृथ्वी का स्वामित्व दिया और जिसने अर्थशास्त्र रूपी महार्णव से नीतिशास्त्र रूपी नवनीत का दोहन किया, ऐसे उस महामति विष्णुगुप्त नामक विद्वान् को नमस्कार है।
नीतिशास्त्रामृतं धीमानर्थशास्त्र महोदधे ।
समुद्दध्रे नमस्तस्मै विष्णुगुप्ताय वेधसे ॥
—नीतिसार
विष्णुगुप्तस्तु कौटिल्यश्चाणक्यो द्रामिलो गुलः ।
वात्स्यायनो मल्लनागः पाक्षिलस्वामिनावपि ॥
वात्स्यायनो मल्लनागः कौटिल्यश्चणकात्मजः ।
द्रामिलः पाक्षिलः स्वामी विष्णुगुप्तो गुलश्च स ।
—हेमचन्द्र
वात्स्यायनस्तु कौटिल्यो विष्णुगुप्तो वराणकः ।
द्रामिल पाक्षिल स्वामी मल्लनागो वलोऽपि च ॥
—यादवप्रकाश-वैजयन्ती
कात्यायनो वररुचिर्मेयजिच्य पुनर्वसुः ।
कात्यायनस्तुकौटिल्यो विष्णुगुप्तो वराणकः ॥
द्रामिलपाक्षिल स्वामी मल्लनागो गुलोऽपि च ।
—भोजराज नाममल्लिका
नीतिसार के अतिरिक्त संस्कृत के कतिपय कोष-ग्रन्थों से भी आचार्य विष्णुगुप्त के पर्यायवाची नामों का पता लगता है, जिनमें कौटिल्य और चाणक्य के अतिरिक्त अनेक अप्रचलित नाम देखने को मिलते हैं। ये नाम प्राचीन और मध्यकालीन सभी ग्रन्थों में मिलते हैं। विभिन्न कोष-ग्रन्थों की इस नामावली की उपलब्धि से आचार्य कौटिल्य के वास्तविक नाम और उनके लिए प्रयुक्त होने वाले दूसरे नामों का स्वतः ही निराकरण हो जाता है।