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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 662 of 918

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Page 662
५७८कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ आठवां अधिकरण

कास्तु सम्भूय पण्यानामुत्कर्षापकर्षं कुर्वाणाः पणे पणशतं कुम्भे कुम्भशत-मित्याजीवन्ति ।
(१) अभिजातोपरुद्धा भूमिः पशुव्रजोपरुद्धा वेति । अभिजातोपरुद्धा भूमिः महाफलाप्यायुधीयोपकारिणी न क्षमा मोक्षयितुं, व्यसनाबाधभयात् । पशुव्रजोपरुद्धा तु कृषियोग्या क्षमा मोक्षयितुं, विवीतं हि क्षेत्रेण बाध्यते । इत्याचार्याः ।
(२) नेति कौटिल्यः । अभिजातोपरुद्धा भूमिरत्यन्तमहोपकारापि क्षमा मोक्षयितुं व्यसनाबाधभयात् । पशुव्रजोपरुद्धा तु कोशवाहनोपकारिणी न क्षमा मोक्षयितुमन्यत्र सस्यवापोपरोधादिति ।
(३) प्रतिरोधकाटविकयोः प्रतिरोधका रात्रिसत्रचराः शरीराक्रमिणो नित्याः शतसहस्रापहारिणः प्रधानकोपकाश्च । व्यवहिताः प्रत्यन्तारण्य-चराश्चाटविकाः प्रकाशा दृश्याश्चरन्त्येकदेशघातकाश्च इत्याचार्याः ।


विक्रेय पदार्थों पर उचित वर्तनी ( व्यापारी मार्गों का टैक्स ) लेकर व्यापारिक मार्गों को उन्नत एवं लाभप्रद बनाता है। किन्तु वैदेहक तो आपस में सलाह करके व्यापारी माल के मूल्य को घटा-बढ़ाकर एक पण के सौ पण और एक कुम्भ के सौ कुम्भ लाभ उठाते हैं।'

( १ ) 'विजिगीषु के पारिवारिक पुरुषों से घिरी हुई भूमि को छोड़ना उचित है या गो आदि पशुओं से घिरी हुई भूमि को छोड़ना ठीक है?' इस संबंध में प्राचीन आचार्यों का मत है कि 'यदि विजिगीषु की भूमि अत्यन्त उपजाऊ; लाभदायक और सैनिकों को देकर उपकार करनेवाली हो तो उसको नहीं छोड़ना चाहिए; क्योंकि आक्रमण के समय सैनिक पुरुषों के अभाव में ऐसी भूमि कष्टकर होती है। पशुओं से घिरी भूमि यदि कृषियोग्य हो तो छोड़ी जा सकती है; क्योंकि चारागाह की अपेक्षा खेती से अधिक लाभ हो सकता है।'

( २ ) किन्तु मत के विरुद्ध कौटिल्य का कहना है कि 'विजिगीषु के पारिवारिक पुरुषों की भूमि सैन्य दृष्टि से उपकारक होने पर भी छोड़ी जा सकती है; क्योंकि उससे सदा ही भय बना रहता है। किन्तु पशुओं की भूमि कोष-संग्रह योग्य घृत तथा बैल आदि को देकर अन्यन्त उपकार करने वाली होती है। इसलिए छोड़ने योग्य नहीं है। किन्तु उसके पास यदि अनाज के खेत हों और चारागाह के कारण उनका नुकसान होता हो तो उसे भी छोड़ा जा सकता है, अन्यथा नहीं।'

( ३ ) प्राचीन आचार्यों की दृष्टि से 'प्रतिरोधक ( लुटेरे ) और आटविक ( जंगली ), इन दोनों में से प्रतिरोधक पुरुष ही प्रजा के लिए अधिक कष्टप्रद हैं; क्योंकि प्रतिरोधक रात्रि में तथा घने जंगलों में घूमने वाले, राहगीर पर आक्रमण