Skip to content
SarvaKosh
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 660 of 918

Read in context
Page 660
५७६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ आठवां अधिकरण

(१) नेति कौटिल्यः । देशविहारः कर्मश्रमवधार्थमल्पं भक्षयति, भक्षयित्वा च भूयः कर्मसु योगं गच्छति । राजविहारस्तु स्वयं वल्लभैश्च स्वयंग्राहप्रणयपण्यागारकार्योपग्रहैः पीडयति इति ।
(२) सुभगाकुमारयोः कुमारः स्वयं वल्लभैश्च स्वयंग्राहप्रणयपण्यागारकार्योपग्रहैः पीडयति । सुभगा विलासोपभोगेनेत्याचार्याः ।
(३) नेति कौटिल्यः । शक्यः कुमारो मंत्रिपुरोहिताभ्यां वारयितुं न सुभगा, बालिश्यादनर्थजनसंयोगाच्चेति ।
(४) श्रेणीमुख्ययोः श्रेणी बाहुल्यादनवग्रहा स्तेयसाहसाभ्यां पीडयति, मुख्यः कार्यानुग्रहविघाताभ्यामित्याचार्याः ।

( १ ) किन्तु उक्त मत के विरोध में कौटिल्य का कहना है कि 'प्रजाजनों का मनोविनोद थोड़े ही व्यय में हो जाता है और वह मनोविनोद उन्हें ताजगी देकर दुगुने उत्साह से फिर काम करने में जुटा देता है । किन्तु राजविहार में तो स्वयं राजा के द्वारा तथा राजा के प्रिय व्यक्तियों के द्वारा जनपद की इच्छा के विरुद्ध धन की लूट-मार की जाती है । पण्यशाला से तथा अतिरिक्त कार्यों को पूरा करने के लिए रिश्वत आदि से धन लेकर प्रजा को पीड़ित किया जाता है ।'

( २ ) प्राचीन आचार्यों का मत है कि 'रानी-विहार और युवराज-विहार, इन दोनों में से युवराज-विहार अधिक कष्टकर होता है; क्योंकि युवराज के द्वारा तथा उसके खुशामदी व्यक्तियों के द्वारा जनपद की इच्छा के विरुद्ध धन लेकर पण्यशाला तथा अन्य कार्यों को पूरा करने के लिए रिश्वत लेकर प्रजा को पीड़ित किया जाता है । किन्तु विलास-प्रिय रानी केवल भोग-विलास की सामग्री द्वारा ही प्रजा को पीड़ित करती है ।'

( ३ ) किन्तु कौटिल्य उक्त मत से सहमत नहीं है, उनका कहना है कि 'युवराज को इस प्रकार के अनर्थकारी कार्यों से अमात्य आदि रोक सकते हैं । परन्तु रानियों के सम्बन्ध में यह बात नहीं हो सकती है; क्योंकि उनमें प्रायः मूर्खता अधिक होती है और फिर अनर्थकारी नीच पुरुषों का संसर्ग होने के कारण उन्हें समझाना बहुत कठिन होता है ।'

( ४ ) प्राचीन आचार्यों के मतानुसार 'श्रेणी ( आयुधजीवी तथा कृषिजीवी व्यक्तियों का संघ ) और मुख्य ( प्रधान कर्मचारियों का समूह ), इन दोनों में से श्रेणी पुरुष ही अधिककष्टकर है; क्योंकि वही चोरी डाका आदि से प्रजा को कष्ट पहुँचाते हैं और उनकी संख्या इतनी अधिक होती है कि उन्हें रोका भी नहीं जा सकता है । किन्तु मुख्य पुरुष केवल रिश्वत के मिलने न मिलने के कारण ही कार्यों बनाने-बिगाड़ने के द्वारा प्रजा को तङ्ग करते हैं ।'