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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 657 of 918

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Page 657
प्रकरण १३०-१३२ <br> अध्याय ४# पीडनवर्गः स्तम्भवर्गः कोशसङ्गवर्गश्च

(१) दैवपीडनमग्निरुदकं व्याधिर्दुर्भिक्षं मरक इति ।

(२) अग्न्युदकयोरग्निपीडनमप्रतिकार्यं सर्वदाहि च, शक्योपगमनं तार्यबाधमुदकपीडनमित्याचार्याः ।

(३) नेति कौटिल्यः । अग्निर्ग्राममर्धग्रामं वा दहति, उदकवेगस्तु ग्रामशतप्रवाहीति ।

(४) व्याधिदुर्भिक्षयोर्व्याधिः प्रेतव्याधितोपसृष्टपरिचारकव्यायामो-परोधेन कर्माण्युपहन्ति, दुर्भिक्षं पुनरकर्मोपघाति हिरण्यपशुकरदायि च इत्याचार्याः ।


पीडनवर्ग, स्तंभवर्ग और कोषसंगवर्ग

( १ ) पीडनवर्ग : राष्ट्र पर आने वाली दैवी विपत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं : १. अग्नि २. जल ३. व्याधि ४. दुर्भिक्ष और ५. महामारी ।

( २ ) प्राचीन आचार्यों का मत है कि 'अग्नि और जल से उत्पन्न होने वाली आपत्तियों में से अग्निजन्य आपत्ति ही अधिक कष्टकर होती है, क्योंकि आग लग जाने पर उसका सरलता से कोई प्रतीकार नहीं किया जा सकता है और आग सब वस्तुओं को जलाकर भस्म कर देती है । किन्तु जल में यह बात नहीं है, क्योंकि शीतल होने से उसका स्पर्श सह्य होता और नौका आदि साधनों के द्वारा उससे अपना काम भी लिया जा सकता है ।'

( ३ ) उक्त मत के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कहना है 'अग्नि किसी एक ही गाँव या आधे ही गाँव को जला सकती है किन्तु जल का प्रवाह एक साथ ही सैकड़ों गाँवों को बहा ले जाता है ।'

( ४ ) पूर्वाचार्यों का कहना है कि 'व्याधि और दुर्भिक्ष इन दोनों में से व्याधि ही अधिक कष्टप्रद होती है, क्योंकि उससे लोग मर जाते हैं, बीमार हो जाते हैं, कृषि आदि कार्य सब ठप हो जाते हैं । परन्तु दुर्भिक्ष के कारण ये सब बाधाएँ नहीं होने पाती । अन्न के अभाव में हिरण्य आदि के द्वारा सरकारी कर चुकाया जा सकता है ।'