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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 652 of 918

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Page 652

५६८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ आठवाँ अधिकरण

वाक्पारुष्यं गरीयः इति विशालाक्षः । परुषमुक्तो हि तेजस्वी तेजसा प्रत्यारो-
हति, दुरुक्तशल्यं हृदि निखातं तेजःसन्दीपनमिन्द्रियोपतापि च इति ।
(१) नेति कौटिल्यः । अर्थपूजा वाक्छल्यमपहन्ति, वृत्तिविलोपेस्त्वर्थ-
दूषणम् । अदानमादानं विनाशः परित्यागो वा अर्थस्येत्यर्थदूषणम् ।
(२) अर्थदूषणदण्डपारुष्ययोरर्थदूषणं गरीयः इति पाराशराः । अर्थ-
मूलौ धर्मकामौ, अर्थप्रतिबन्धश्च लोको वर्तते, तस्योपघातो गरीयान् इति ।
(३) नेति कौटिल्यः । सुमहताऽप्यर्थेन न कश्चन शरीरविनाशमिच्छेत् ।
दण्डपारुष्याच्च तमेव दोषमन्येभ्यः प्राप्नोति । इति कोपजस्त्रिवर्गः ।
(४) कामजस्तु—मृगया द्यूतं स्त्रियः पानमिति चतुर्वर्गः । तस्य मृग-
याद्यूतयोर्मृगया गरीयसी इति पिशुनः स्तेनामित्रव्यालदावप्रस्खलनभय-


अपने तिरस्कार को सहन न करने वाले पुरुष के साथ कठोर वाक्यों का व्यवहार करने पर वह निश्चित ही कठोरभाषी व्यक्ति पर अपने तेज के द्वारा आक्रमण करता है । हृदय में गड़ा हुआ दुर्वचन भीतरी तेज को उभाड़ने वाला और इन्द्रियों को संतप्त करने वाला होता है । इसलिए अर्थदूषण की अपेक्षा वाक्पारुष्य को ही अधिक हानिकर समझना चाहिए ।'

( १ ) किन्तु, विशालाक्ष के मत के विरुद्ध कौटिल्य का कहना है कि 'अर्थ द्वारा की गई पूजा दुर्वचनरूपी शल्य को नष्ट कर देती है, किन्तु वाणी द्वारा की गई पूजा अर्थदूषण को नहीं हटा सकती है, किसी की जीविका मारना ही अर्थदूषण है । प्रिय वचन जीविका के विघात को पूरा नहीं कर सकते हैं । अर्थदूषण चार प्रकार का होता है । १. अदान ( कार्य करने पर भी वेतन न देना ) २. आदान ( दण्ड आदि के द्वारा धन खींच लेना ) ३. विनाश ( देश को पीड़ा पहुँचाना ) और ४. अर्थत्याग ( रक्षा योग्य अर्थ की रक्षा न करना ) ।'

( २ ) आचार्य पराशर के अनुयायियों का कहना है कि 'अर्थदूषण और दण्डपारुष्य में अर्थदूषण ही बलवान् होता है, क्योंकि धर्म, काम और लोकनिर्वाह सभी अर्थ पर निर्भर होते हैं । इसलिए अर्थ का उपघात ( दूषण ) होना अत्यन्त ही आपत्तिजनक है । इसलिए दण्डपारुष्य की अपेक्षा अर्थदूषण को ही बड़ा समझना चाहिए ।'

( ३ ) किन्तु कौटिल्य उक्त मत को युक्तिसंगत नहीं मानता है । उसका कहना है कि 'अत्यधिक धन-प्राप्ति के बदले में कोई भी अपने को नष्ट नहीं करना चाहता है, पुनः दण्डपारुष्य से आत्मरक्षा के लिए वह उतनी ही धन-राशि खर्च करने के लिए तैयार रहता है । इसलिए अर्थदूषण की अपेक्षा दण्डपारुष्य को ही अधिक कष्टकर समझना चाहिए ।' यहाँ तक कोपजन्य त्रिवर्ग का निरूपण किया गया ।

( ४ ) कामजन्य चतुर्वर्ग : मृगया, द्यूत, स्त्री और मदिरापान, ये कामज चार