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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 644 of 918

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Page 644
५६०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ आठवां अधिकरण

(१) दण्डमित्रव्यसनयोर्मित्रव्यसनमिति वातव्याधिः। मित्रमभृतं व्यवहितं च कर्म करोति, पार्ष्णिग्राहमासारममित्रमाटविकं च प्रतिकरोति, कोशदण्डभूमिभिश्चोपकरोति व्यसनावस्थायोगमिति ।

(२) नेति कौटिल्यः। दण्डवतो मित्रं मित्रभावे तिष्ठत्यमित्रो वामित्रभावे। दण्डमित्रयोस्तु साधारणे कार्ये सारतः स्वयुद्धदेशकाललाभाद्विशेषः। शीघ्राभियाने त्वमित्र्राटविकाभ्यन्तरकोपे च न मित्रं विद्यते। व्यसनयौगपद्ये परवृद्धौ च मित्रमर्थयुक्तौ तिष्ठति ।

(३) प्रकृतिव्यसनसम्प्रधारणमुक्तमिति ।

(४) प्रकृत्यवयवानां तु व्यसनस्य विशेषतः।
बहुभावोऽनुरागो वा सारो वा कार्यसाधकः॥
(५) द्वयोस्तु व्यसने तुल्ये विशेषो गुणतः क्षयात्।
शेषप्रकृतिसाद्गुण्यं यदि स्यान्नाभिधेयकम् ॥


प्रयोजनसिद्धि होने के कारण कोष के ऊपर आई हुई विपत्ति को ही गरीयसी समझना चाहिए ।'

( १ ) आचार्य वातव्याधि ( उद्धव ) का मत है कि 'अपनी सेना और अपने मित्र पर एक साथ पड़ी विपत्ति में मित्र पर पड़ी विपत्ति अधिक कष्टकर है; क्योंकि दूर रहता हुआ भी मित्र बिना कुछ लिए विजिगीषु का कार्य करता है और पार्ष्णिग्राह का, पार्ष्णिग्राह के मित्रवल का, शत्रु का तथा आटविक का सदैव प्रतीकार करने के लिए तैयार रहता है। कोष, सेना और भूमि के द्वारा वह बराबर विजिगीषु की मदद करता रहता है। विपत्ति में साथ नहीं छोड़ता है ।'

( २ ) किन्तु कौटिल्य, वातव्याधि के उक्त सिद्धान्त से सहमत नहीं है । उसका कहना है कि 'जिसके पास अच्छा सैन्यबल होता है, उसके मित्र तो मित्र ही बने रहते हैं, किन्तु शत्रु तक भी मित्र बन जाते हैं । सेना और मित्र, इनके साधारण कार्य में लाभ के अनुसार अपने युद्ध, देश और काल की अपेक्षा विशेषता समझनी चाहिए । तत्कालिक आक्रमण पर अथवा शत्रु और आटविकों के द्वारा आभ्यन्तर कोप उत्पन्न करा देने पर मित्र लोग उसका कोई प्रतीकार नहीं करा सकते हैं; बल्कि सेना ही ऐसे अवसरों पर काम आती है । एक साथ विपत्ति आने पर अथवा शत्रु के बढ़ जाने के कारण मित्र ही अर्थ-सिद्धि में सहायक होता है ।'

( ३ ) यहाँ तक प्रकृति-व्यसन का निरूपण किया गया ।

( ४ ) यदि प्रकृति के कुछ अंगों पर विपत्ति आ पड़ी हो तो जिस प्रकृति पर व्यसन पड़ा है उसकी अधिक संख्या, स्वामिभक्ति और विशेष गुणों के अनुसार ही उस विपत्ति को दूर करना चाहिए ।

( ५ ) यदि शत्रु और विजिगीषु दोनों पर एक साथ ही व्यसन आ पड़ा हो तो