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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 640 of 918

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Page 640
५५६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ आठवां अधिकरण

प्रतिषेधो राज्यरक्षणं व्यसनप्रतीकारः कुमाररक्षणमभिषेकश्च कुमाराणा-
मायत्तमामात्येषु । तेषामभावे तदभावः । छिन्नपक्षस्येव राज्ञश्चेष्टानाशः ।
व्यसनेषु चासन्नाः परोपजापाः । वैगुण्ये च प्राणबाधः प्राणान्तिकचरत्वा-
द्राज्ञ इति ।

(१) नेति कौटिल्यः । मन्त्रिपुरोहितादिभृत्यवर्गमध्यक्षप्रचारं पुरुष-
द्रव्यप्रकृतिव्यसनप्रतीकारमेधनं च राजैव करोति । व्यसनिषु वामात्येषु
अन्यानाव्यसनिनः करोति । पूज्यपूजने दूष्यावग्रहे च नित्ययुक्तस्तिष्ठति ।
स्वामी च सम्पन्नः स्वसम्पद्भिः प्रकृतीः सम्पादयति । स्वयं यच्छीलस्त-
च्छीलाः प्रकृतयो भवन्ति । उत्थाने प्रमादे च तदायत्तत्वात् । तत्कूटस्था-
नीयो हि स्वामीति ।

(२) अमात्यजनपदव्यसनयोर्जनपदव्यसनं गरीय इति विशालाक्षः ।


आय-व्यय की व्यवस्था, सैन्यसंग्रह, शत्रु तथा आटविकों का प्रतीकार, राज्य की
सुरक्षा, विपत्तियों का दमन, राजकुमारों की रक्षा और उनका अभिषेक आदि कार्यों
को सम्पन्न करना अमात्यों पर ही निर्भर है । इसलिए राजा की अपेक्षा अमात्य का
व्यसन अधिक भयप्रद है । अमात्यों के अभाव में सारे राजकार्य नष्ट हो जाते हैं और
परकटे पक्षी के समान राजा के सारे कार्यक्रम ही चौपट हो जाते हैं तथा व्यसनों का
लाभ उठा कर शत्रु षड्यन्त्रों का जाल बिछा देते हैं । अमात्यों के व्यसनी या विपरीत
हो जाने पर राजाओं के प्राण खतरे में पड़ जाते हैं; क्योंकि अमात्य, राजाओं के प्राण
के समान होते हैं ।'

(१) इस मत के विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'मन्त्री, पुरोहित
आदि भृत्यवर्ग को, सम्पूर्ण विभागीय अध्यक्षों के कार्य को, अमात्य तथा सेना आदि
प्रकृतिवर्ग की विपत्ति को और जनपद, दुर्ग, कोष आदि द्रव्य प्रकृति की विपत्ति को
दूर कर उनकी उन्नति के कार्यों को राजा स्वयं सम्पन्न कर सकता है । अमात्य यदि
व्यसनी हो गये हों तो उनके स्थान पर राजा अव्यसनी अमात्यों को नियुक्त कर
सकता है । राजा ही पूज्य व्यक्तियों का सम्मान और दुष्ट व्यक्तियों का निग्रह कर
सकता है । वही अपने राज्योग्य गुणों से अपनी अमात्य प्रकृति को गुणसम्पन्न बना
सकता है; क्योंकि राजा स्वयं जिस स्वभाव का होता है उसकी प्रकृतियाँ भी वैसे ही
स्वभाव की हो जाती हैं । राजा पर ही उसकी प्रकृतियों का अभ्युदय एवं पतन
निर्भर होता है । क्योंकि सातों प्रकार की प्रकृतियों में राजा ही प्रधान होता है,
इसलिए मूल प्रकृति राजा का जैसा स्वभाव हो उसकी विकृतियों का भी वैसा ही
स्वभाव होता है ।'

(२) आचार्य विशालाक्ष का अभिमत है कि 'अमात्य के व्यसन की अपेक्षा