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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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वादी ढंग से परखने का यत्न किया और यह स्वीकार किया कि मनुष्य की चेतना ही उसकी सत्ता का आधार रही है; किन्तु अब भौतिकवादी ढंग से इतिहास की गवेषणा करने पर यह सिद्ध हो गया है कि मनुष्य की सत्ता को उसकी चेतना का आधार प्राप्त है। अब आवश्यकता इस बात को दिखाने की है कि ऐतिहासिक विकास की एक निश्चित अवस्था में पूंजीवाद का उत्पन्न होना अनिवार्य है; और इसलिए उस अवस्था के परिपक्व हो जाने पर उसका पतन भी निश्चित है।

इतिहास-संबंधी इस भौतिकवादी धारणा का महान् आविष्कारक था, मार्क्स। मार्क्स ने यह सिद्ध किया है कि उत्पादन और उत्पादित वस्तुओं का विनिमय ही समाज-व्यवस्था का आधार रहा है। इस आधार पर सामाजिक परिवर्तनों तथा राजनीतिक क्रांतियों का पता लगाने के लिए हमें न तो सत्य, न्याय एवं विचारों की खोज करनी चाहिए; बल्कि यह देखना चाहिए कि उस युग की उत्पादन तथा विनियम-प्रणाली में क्या-क्या परिवर्तन हुए। यह एक बहुत बड़ा सत्य अर्थशास्त्रियों ने खोज निकाला है कि किसी युग की ठीक परिस्थितियों का सही ज्ञान, उस युग की दार्शनिक विचारधारा से प्राप्त न होकर उस युग की आर्थिक परिस्थितियों से उपलब्ध हो सकता है।

उत्पादन और विनिमय का तुमुल संघर्ष आज भी पूरी शक्ति पर है। भारत जैसे देश में, जहाँ कि समाजवादी व्यवस्था का आगमन एक नये युग के समान माना जायेगा और जिसके आगमन की माँग दिनों-दिन बढ़ रही है, उत्पादन तथा विनिमय का माध्यम बहुत ही असंतुलित है। इस असंतुलन एवं असंगति को दूर करने का केवल एक ही तरीका है कि :

"सर्वहारा वर्ग राजसत्ता पर अधिकार कर ले। इस सत्ता के सहारे उत्पादन के साधनों को पूंजीवादियों के दुर्बल हाथों से छीन करके उन्हें सार्वजनिक सम्पत्ति बना दिया जाय। इस कार्य द्वारा उत्पादन के साधनों को पूंजी के बन्धनों से वह मुक्त कर देगा और अपने सामाजिक स्वरूप की प्रतिष्ठा करने का उन्हें सु-अवसर देगा। उस अवस्था में समाज का उत्पादन पहिले से बनी योजना के अनुसार संभव हो सकेगा। उत्पादन का विकास हो जाने से समाज में विभिन्न वर्गों का अस्तित्व अनावश्यक और निरर्थक बन जायेगा। जैसे-जैसे सामाजिक उत्पादन के क्षेत्र से अराजकता दूर होगी, वैसे-ही-वैसे राज्य के राजनीतिक अधिकारों का भी अन्त हो जायेगा। मनुष्य अपने सामाजिक संघटन का स्वामी बन जायेगा; अतः वह प्रकृति का