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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 617 of 918

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Page 617

प्र० १२१ : अ० १६ ] अधीनस्थ राजाओं से व्यवहार ५३३

(१) सामन्ताटविकतत्कुलीनावरुद्धानामन्यतमोपग्रहेण कोशदण्डभूमि-
दाययाचनमिति भेदमाचरेत् । प्रकाशकूटतूष्णींयुद्धदुर्गलम्भोपायैरमित्रप्रग्र-
हणमिति दण्डमाचरेत् ।

(२) एवमुत्साहवतो दण्डोपकारिणः स्थापयेत्, स्वप्रभाववतः कोशोप-
कारिणः, प्रज्ञावतो भूम्युपकारिणः ।

(३) तेषां पण्यपत्तनग्रामखनिसञ्जातेन रत्नसारफल्गुकुप्येन द्रव्य-
हस्तिवनव्रजसमुत्थेन यानवाहनेन वा यद्वहुश उपकरोति तच्चित्रभोगं,
यद्दण्डेन कोशेन वा महदुपकरोति तन्महाभोगं, यद्दण्डकोशभूमीरुपकरोति
तत्सर्वभोगम् ।


( १ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह सामन्त, आटविक, शत्रु राजा का सम्बन्धी, नजरबन्द शत्रु राजा का पुत्र आदि, इनमें से किसी एक को अपने वश में करके उसके द्वारा कोष, सेना, भूमि और दायभाग की याचना करवा कर बलवान् राजा एवं उसके सामन्त आदि के बीच भेद डाल देना चाहिए अर्थात् इन योजनाओं द्वारा भेदरूप उपाय का प्रयोग करना चाहिए । इसी प्रकार प्रकाशयुद्ध ( देश-काल की सूचना देकर किया जाने वाला युद्ध ), कूटयुद्ध ( देश-काल की सूचना दिये बिना या गलत सूचना देकर किया जाने वाला युद्ध ) और तूष्णीयुद्ध ( छिपे तौर पर गूढपुरुषों द्वारा शत्रु को मरवा देना ), इन तीन प्रकार के युद्धों द्वारा, तथा दुर्गलम्भोपाय प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों द्वारा शत्रु को वश में करना चाहिए—यही दण्डरूप उपाय के प्रयोग का तरीका है ।

( २ ) इस प्रकार के उपायों द्वारा अपने अधीन हुए उत्साही एवं सेना का उपकार करने वाले राजाओं को सैनिक कार्यों पर नियुक्त किया जाय । इसी प्रकार कोषसंपन्न व्यक्तियों को कोष संबंधी कार्यों पर और सुयोग्य मन्त्रशक्ति सम्पन्न व्यक्तियों को भूमि सम्बन्धी कार्यों पर नियुक्त किया जाय, जो कि उनकी यथोचित व्यवस्था कर सकें ।

( ३ ) अधीनस्थ मित्र राजाओं में से जो राजा बाजारों, नगरों, गांवों, खदानों से उत्पादित रत्न एवं चंदन आदि पदार्थ, शंख आदि फल्गु पदार्थ तथा वस्त्र आदि द्रव्यों को देकर, अथवा लकड़ियों-हाथियों के जंगल, गाय, रथ; हाथी आदि को देकर विजिगीषु राजा का अत्यन्त उपकार करता है वह मित्र, चित्रभोग कहा जाता है । जो मित्र राजा सेना और कोष के द्वारा विजिगीषु का महान् उपकार करता है वह महाभोग कहलाता है । जो मित्र राजा सेना, कोष और भूमि आदि के द्वारा विजि-गीषु का सर्वांगीण उपकार करता है उसको सर्वभोग कहते हैं ।