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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 615 of 918

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Page 615

प्र० ११९-१२० : अ० १५ ] शत्रु के साथ व्यवहार ५३१

कुर्वीत । दुष्टपौरजानपदो वा न्यायवृत्तिरन्यां भूमिं याचेत । दूष्यवदुपांशुदण्डेन वा प्रतिकुर्वीत । उचितां वा मित्राद् भूमिं दीयमानां न प्रतिगृह्लीयात् । मन्त्रिपुरोहितसेनापतियुवराजानामन्यतममदृश्यमाने भर्तरि पश्येत् ।

(१) यथाशक्ति चोपकुर्यात् । दैवतस्वस्तिवाचनेषु तत्परा आशिषो वाचयेत् । सर्वत्रात्मनिसर्गं गुणं ब्रूयात् ।

(२) संयुक्तबलवत्सेवी विरुद्धः शङ्कितादिभिः ।
वर्तेत दण्डोपनतो भर्त्र्यैवमवस्थितः ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे बलवता विगृह्योपरोधहेतवः दण्डोपनतवृत्तं नाम पञ्चदशोऽध्यायः, आदितो द्वादशोत्तरशततमः ।

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करने और मनोविनोद के लिए बाहर जाने-आने आदि सब कार्यों को वह विजेता की अनुमति से करे । अपने राज्य के प्रकृतिमण्डल के साथ संधि आदि या उपघात अथवा दूसरे राज्य में भाग जाने वाले के लिए किसी भी प्रकार की दण्ड व्यवस्था, विजेता राजा की अनुमति से ही करे । यदि ऐसा राजा अन्यायी हो जाय या पौर जनपद उससे विरुद्ध हो जाय तो ऐसी स्थिति में वह अपनी पैतृक भूमि को छोड़कर अपने निवास के लिए दूसरी भूमि की याचना करे; अथवा दूष्य द्वारा उपांशुदण्ड से उसका प्रतीकार किया जाय । यदि विजेता राजा अपने किसी पराजित मित्र राजा की भूमि छीन कर उसको दे तो उसे वह स्वीकार न करे । विजयी राजा की सेवा करते हुए पराजित राजा को चाहिए कि वह अपने मंत्री, पुरोहित, सेनापति और युवराज आदि किसी को भी सेवक की अवस्था में न दिखे; अर्थात् उसके सेवक जब उसे देखें तो अपने स्वामी के ही रूप में देखें; किसी के सेवक के रूप में नहीं ।

(१) पराजित राजा को चाहिए कि समय-समय पर वह अपने मालिक को उपहार देता रहे । देवाराधन और मांगलिक कृत्यों के अवसर पर अपने मालिक के लिए दुआयें माँगे । सबके सामने स्वयं को स्वामी का समर्पण बताये तथा उसके गुणों का कीर्तन करे ।

(२) इस प्रकार अपने विजेता राजा की सेवा करते हुए विजित राजा को चाहिए कि वह उसके शक्तिशाली अमात्य आदि के साथ सदा अनुकूल बर्ताव करे और जो विजेता के विरोधी हों या जिन पर उसका शक हो, उनके सदा वह विरुद्ध रहे ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ।

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