कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| प्रकरण ११७ | पार्ष्णिग्राहचिन्ता |
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| अध्याय १३ |
(१) संहत्यारिविजिगीष्वोरमित्रयोः पराभियोगिनोः पार्ष्णिं गृह्णतोर्यः शक्तिसम्पन्नस्य पार्ष्णिं गृह्णाति, सोऽतिसन्धत्ते। शक्तिसम्पन्नो ह्यमित्रमुच्छिद्य पार्ष्णिग्राहमुच्छिन्द्यात्, न हीनशक्तिरलब्धलाभ इति।
(२) शक्तिसाम्ये यो विपुलारम्भस्य पार्ष्णिं गृह्णाति, सोऽतिसन्धत्ते। विपुलारम्भो ह्यमित्रमुच्छिद्य पार्ष्णिग्राहमुच्छिन्द्यात्, नाल्पारम्भः सक्तचक्र इति।
(३) आरम्भसाम्ये यः सर्वसन्दोहेन प्रयातस्य पार्ष्णिं गृह्णाति, सोऽतिसन्धत्ते। शून्यमूलो ह्यस्य सुकरो भवति, नैकदेशबलप्रयातः कृतपार्ष्णिप्रतिविधान इति।
पार्ष्णिग्राह-चिन्ता
(१) विजिगीषु और शत्रु जब पृष्ठवर्ती (पार्ष्णि) होकर किसी राजा पर चढ़ाई करें तो उनमें से वही विशेष लाभ प्राप्त करता है, जो कि दूसरे के साथ युद्ध में फँसे हुए अपने शत्रुभूत दो राजाओं में से अधिक शक्तिशाली राजा की पार्ष्णि को ग्रहण करता है क्योंकि शक्तिशाली राजा अपने शत्रु का उच्छेद कर बाद में अपने पार्ष्णिग्राह का भी उच्छेद कर देता है। हीनशक्ति शत्रुराजा तो अपने शत्रु का उच्छेद करने पर भी वैसे ही निर्बल बना रहता है, उसकी ओर से आक्रमण की कोई आशंका नहीं हो सकती है। इसलिए उसका पार्ष्णिग्राह बनने में कोई लाभ नहीं है।
(२) यदि दोनों युद्ध-निरत शत्रु समानशक्ति हों तो उसी का पार्ष्णिग्राह बनना लाभप्रद है, जो कि सभी साधनों से सम्पन्न हो। क्योंकि सर्वसाधन-सम्पन्न शत्रु राजा अपने शत्रु का उच्छेद कर सकता है। जो कि साधनहीन और अपनी बिखरी सेना को बटोरने में ही लगा हो, ऐसा शत्रु न तो अपने शत्रु को जीत ही सकता है और न ही वह विजिगीषु के लिए भय का कारण है। इसलिए ऐसे शत्रु का पार्ष्णिग्राह बनने में कोई लाभ नहीं है।
(३) यदि दोनों ही सर्वसाधनसम्पन्न हों तो ऐसे राजा का पार्ष्णिग्राह बनने में विशेष लाभ है, जो अपने संपूर्ण सैन्य को लेकर युद्ध के लिये कूच कर गया हो। क्योंकि जिसका मुख्य भाग (राज्य या राजधानी) असुरक्षित हो उस पर शीघ्र ही विजय प्राप्त की जा सकती है। किन्तु जिसने अपनी पार्ष्णि की रक्षा के लिए प्रबन्ध