कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
Page 598 of 918
Read in context५१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
(१) नेति कौटिल्यः । कम्बलाजिनाश्वपण्यवर्ज्याः शंखवज्रमणिमुक्ता-सुवर्णपण्याश्च प्रभूततरा दक्षिणापथे ।
(२) दक्षिणापथेऽपि बहुखनिः सारपण्यः प्रसिद्धगतिरल्पव्यायामो वा वणिक्पथः श्रेयान् । प्रभूतविषयो वा फल्गुपण्यः ।
(३) तेन पूर्वः पश्चिमश्च वणिक्पथो व्याख्यातः ।
(४) तत्रापि चक्रपादपथयोश्चक्रपथो विपुलारम्भत्वाच्छ्रेयान् । देशकालसम्भावनो वा खरोष्ट्रपथः ।
(५) आभ्यामंसपथो व्याख्यातः ।
(६) परकर्मोदयो नेतुः क्षयो वृद्धिविपर्यये ।
तुल्ये कर्मपथे स्थानं ज्ञेयं स्वं विजिगीषुणा ॥
ओर हाथी, घोड़े, कस्तूरी, दांत, चाप, चांदी और सुवर्ण आदि बहुमूल्य विक्रेय वस्तुयें अधिकता से मिल जाती हैं।' यह प्राचीन आचार्यों का मत है ।
( १ ) परन्तु कौटिल्य का कहना है कि 'कंबल, चमड़ा और घोड़े इन वस्तुओं को छोड़ कर हाथी आदि तथा शंख, हीरा, मणि, मोती, सुवर्ण आदि अन्य अनेक विक्रेय वस्तुएँ उत्तर की अपेक्षा दक्षिण की ओर अधिक होती हैं । इसलिए दक्षिणापथ ही श्रेष्ठ है ।'
( २ ) दक्षिणापथ में भी वह मार्ग उत्तम समझना चाहिए, जो खान तथा विक्रेय वस्तुओं से युक्त, आने-जाने में सुगम और थोड़े से परिश्रम से सिद्ध होने वाला हो । अथवा वह मार्ग श्रेष्ठ समझना चाहिए जहाँ थोड़े कीमत की वस्तुयें बहुतायत से मिल सकें या जहाँ बहुमूल्य वस्तुओं से अधिक खरीदार हों ।
( ३ ) इसी प्रकार पूरब और पश्चिम के व्यापारिक मार्गों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए ।
( ४ ) इन व्यापारिक मार्गों में भी पैदल मार्ग की अपेक्षा सवारी योग्य मार्ग को उत्तम समझना चाहिए । क्योंकि ऐसे मार्गों से बहुत व्यापार किया जा सकता है । विक्रेय वस्तुएँ अधिक तादाद में लायी-ले जायी जा सकती हैं। देश-काल के अनुसार गधों और ऊँटों का मार्ग भी श्रेष्ठ समझना चाहिए, क्योंकि उनसे भी अधिक व्यापार किया जा सकता है ।
( ५ ) इसी प्रकार कन्धों के द्वारा भार ढोने वाले बैल आदि के व्यापारिक मार्गों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए ।
( ६ ) शत्रु का अपने कार्यों से लाभ होना ही विजिगीषु का क्षय समझना चाहिए और अपने कार्यों की सिद्धि में ही सफलता समझनी चाहिए । यदि कार्यफल दोनों को बराबर मिले तो विजीगीषु को पूर्ववत् एक जैसा समझना चाहिए । उसने न तो उन्नति की न तो अवनति ।