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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 589 of 918

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Page 589
प्रकरण ११६
अध्याय ११

अनवसितसन्धि


(१) 'त्वं चाहं च शून्यं निवेशयावह' इत्यनवसितसन्धिः ।
(२) तयोर्यः प्रत्युपस्थितार्थो यथोक्तगुणां भूमिं निवेशयति सोऽतिसन्धत्ते ।
(३) तत्रापि स्थलमौदकं वेति । महतः स्थलादलपमौदकं श्रेयः, सातत्यादवस्थितत्वाच्च फलानाम् ।
(४) स्थलयोरपि प्रभूतपूर्वापरसस्यमल्पवर्षपाकमसक्तारम्भं श्रेयः ।
(५) औदकयोरपि धान्यवापमधान्यवापाच्छ्रेयः । तयोरल्पबहुत्वे धान्यकान्तादलपान्महद्धान्यकान्तं श्रेयः । महत्यवकाशे हि स्थाल्याश्चानूप्याश्चौषधयो भवन्ति । दुर्गादीनि च कर्माणि प्राभूत्येन क्रियन्ते । कृत्रिमा हि भूमिगुणाः ।


अनवसित संधि

( संधि-विचार ३ )

( १ ) 'आओ, तुम और हम मिलकर शून्य भूमि में उपनिवेश बसायें !' इस प्रकार से जो सन्धि की जाय उसको अनवसित ( अनिश्चित ) सन्धि कहते हैं ।

( २ ) उन दोनों में से जो, पूर्ण साधनों को साथ लेकर पूर्वोक्त गुणसंपन्न भूमि में उपनिवेश बसाता है वही विशेष लाभ में रहता है ।

( ३ ) सर्वगुणसंपन्न स्थलभूमि और जलभूमि, दोनों में जलभूमि को बसाना ही श्रेष्ठ है । अधिक स्थलभूमि की अपेक्षा थोड़ी ही जलभूमि अच्छी है; क्योंकि सदा ही वह फल-फूल आदि से गुलजार बनी रहती है ।

( ४ ) दो स्थल भूमियों में भी वही स्थलभूमि अच्छी होती है, जहाँ वसंत और शरद की फसलें एक समान अच्छी होती हैं तथा जहाँ थोड़ी ही वृष्टि से फसलें पक कर तैयार हो जाती हैं और जिनको सरलता से जोता-बोया जा सकता है ।

( ५ ) दो जलमय भूमियों में वही भूमि उत्तम है, जहाँ सभी धान्य बोये जा सकें और जहाँ धान्य न हों वह भूमि अच्छी नहीं है । उनमें भी कम-ज्यादा को दृष्टि में रखकर उपजाऊ अधिक भूमि ही श्रेष्ठ है; क्योंकि अधिक विस्तार होने से उसके जल स्थल युक्त विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रकार के अन्न उपजाये जा सकते हैं । क्योंकि