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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 582 of 918

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Page 582

४९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

(१) विजिगीषोरमित्रं यन्मित्रमन्तर्धितां गतम् ।
उपकारे निविष्टं वाशक्तं वानुपकारि तत् ॥
(२) प्रियं परस्य वा रक्ष्यं पूज्यसम्बन्धमेव वा ।
अनुगृह्णाति यन्मित्रं शत्रुसाधारणं हि तत् ॥
(३) प्रकृष्टभौमं सन्तुष्टं बलवच्चालसं च यत् ।
उदासीनं भवत्येतद्व्यसनादवमानितम् ॥
(४) अरेर्नेतुश्च यद्वृद्धि दौर्बल्यादनुवर्तते ।
उभयस्याप्यविद्विष्टं विद्यादुभयभावि तत् ।
(५) कारणाकरणध्वस्तं कारणाकरणागतम् ।
यो मित्रं समपेक्षेत स मृत्युमुपगूहति ॥

(६) क्षिप्रमल्पो लाभश्चिरान्महानिति वा । 'क्षिप्रमल्पो लाभः कार्य-देशकालसंवादकः श्रेयान्' इत्याचार्याः ।

(७) नेति कौटिल्यः । चिरादविनिपाती बीजसधर्मा महान् लाभः श्रेयान्, विपर्यये पूर्वः ।


( १ ) जो विजिगीषु राजा अमित्र तथा शत्रु-विजिगीषु के बीच होने के कारण मित्र हो तथा इच्छा होने पर भी जो दोनों का उपकार न कर सके वह भी उभय-भावि मित्र है।

( २ ) जो विजिगीषु का मित्र हो तथा शत्रु का भी प्रिय एवं रक्ष्य ( रक्षा किए जाने योग्य ) हो और शत्रु के साथ जिसका कोई पूज्य सम्बन्ध हो, वह भी उभय-भावि मित्र कहलाता है ।

( ३ ) दूसरे देश में रहने वाला, सन्तोषी, बलवान् और आलस्य एवं व्यसनों के कारण तिरस्कृत मित्र उपकार करने के समय उदासीन हो जाया करता है ।

( ४ ) जो मित्र दुर्बल होने के कारण शत्रु और विजिगीषु दोनों का अनुगामी होता है । किसी से भी द्वेष न करके दोनों की आज्ञा को मानता है वह भी उभय-भावि मित्र कहलाता है ।

( ५ ) अकारण गत और अकारण आगत मित्र को जो आश्रय देता है । वह निश्चय ही अपनी मौत को स्वयं बुलाता है ।

( ६ ) 'शीघ्र होने वाला थोड़ा लाभ अच्छा है या देर में होने वाला बड़ा लाभ अच्छा है?' इस पर पूर्वाचार्यों का कथन है कि शीघ्र हो जाने वाला थोड़ा लाभ श्रेयस्कर है, क्योंकि उससे देश, काल और कार्य के लाभ को जाना जा सकता है ।

( ७ ) किन्तु कौटिल्य इससे सहमत नहीं है । उसका कहना है कि देर में होने