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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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भुगतान न करना; समझौतों को भंग करना; क्रय-विक्रय की व्यवस्था का उल्लंघन करना; स्वामी तथा भृत्य के बीच विवाद पैदा होना; सीमा संबंधी अड़चन का उपस्थित होना; किसी को मारना; किसी का अपमान करना; किसी की चोरी करना; हिसा तथा व्यभिचार करना; वैयक्तिक कर्तव्यों को न निभाना; पैतृक सम्पत्ति के बँटवारे में मतभेद हो जाना; और जुआ तथा पांसा आदि खेलना ।

इस प्रकार के किसी भी विवाद के उपस्थित हो जाने पर कौटिल्य का कहना है कि न्यायाधीश को चाहिये कि वह किसी भी वादी-प्रतिवादी को न धमकाये; या अपमान करे; या न्यायालय से बाहर निकाले । किसी मामले में व्यक्तिगत दबाव नहीं डालना चाहिए । मुकदमे का लेखक वादी-प्रतिवादी के बयानों में न तो अस्पष्ट बयानों को टाले और न ही स्पष्ट कही हुई बातों को अन्यथा या संदिग्ध रूप में लिखे । प्रधान न्यायाधीश का कर्तव्य था कि वह प्रत्येक निर्णीत मुकदमे का पुनर्निरीक्षण करे और उसके सभी पहलुओं को अच्छी तरह से देखे । न्याय की प्रभावशाली व्यवस्था का परिचय हमें कौटिल्य के उस वाक्य से मिलता है, जिसमें लिखा गया है कि "जब राजा किसी निरपराध व्यक्ति को दण्ड देता है तो उस किये गये अर्थदण्ड का तीस गुना द्रव्य राजा को वरुण देवता के निमित्त जल में फेंकना पड़ता है, जो कि बाद में ब्राह्मणों में बाँट दिया जाता है ( अर्थशास्त्र, पृ० ४०२ ) । इससे पता चलता है कि पूरी सावधानी रखने के बावजूद भी न्याय में त्रुटि रह जाने की संभावना थी और राजा तक उस सर्वोच्च न्याय-व्यवस्था से नियमित था । अर्थशास्त्र में उद्धृत अपराधों और अपराधियों की सूची को देखकर पता चलता है कि न्याय की दिशा में कौटिल्य के विचार कितने परिष्कृत और कितने ठोस थे ।

कौटिल्य की कानून-व्यवस्था के अनुसार राज्य के सभी व्यक्ति एकसमान माने गये हैं । यहाँ तक कि जिस ब्राह्मण के प्रति पक्षपात का दोषारोपण किया जाता है, अपराध के आगे वह भी अन्य जातियों के समान दण्डभागी माना गया है । स्वयं राजा के लिये दण्ड-व्यवस्था निर्धारित करके कौटिल्य की न्याय-व्यवस्था में जनतन्त्र की भावना को सर्वोपरि स्वीकार किया गया है । एक सामाजिक व्यक्ति का परिवार के प्रति, माता-पिता, पति-पत्नी, पुत्र, शासक, शासित, नौकर, श्रमिक, व्यापारी, कलाकार, धोबी, ग्वाला और ग्राहक आदि के प्रति क्या कर्तव्य है, इसकी भी व्यापक व्याख्या कौटिल्य ने की है ।