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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 549 of 918

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Page 549

प्र० १०१-१०२ : अ० ३ ] शक्ति के अनुसार व्यवहार ४६५

(१) भूमीनामात्तसाराणां मूलवर्जं प्रणामनम् ।
उच्छिन्नसन्धिरस्तत्रैष परव्यसनकांक्षिणः ॥
(२) फलदानेन भूमीनां मोक्षणं स्यादवक्रयः ।
फलातिमुक्तो भूमिभ्यः सन्धिः स परदूषणः ॥
(३) कुर्याद्वेक्षणं पूर्वौ पश्चिमौ त्वबलीयसम् ।
आदाय फलमित्येते देशोपनतसन्धयः ॥
(४) स्वकार्याणां वशेनैते देशे काले च भाषिताः ।
आबलीयसिकाः कार्यास्त्रिविधा हीनसन्धयः ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे समहीनज्यायसां गुणाभिनिवेशो
हीनसन्धिर्नाम तृतीयोऽध्यायः,
आदितः शततमः ।

—: ० :—


( १ ) राजधानी और दुर्गों को छोड़ कर सारहीन भूमि शत्रु को देकर जो संधि की जाती है उसको उच्छिन्नसन्धि कहते हैं । यह सन्धि उस राजा के लिए बड़ी हितकर है जो इस इन्तजारी में हो कि कब शत्रु पर विपत्ति पड़े और कब में अपनी भूमि को वापिस ले लूं ।

( २ ) जिस सन्धि में भूमि की पैदावार को देकर भूमि को छुड़ा लिया जाय उसका नाम अपक्रयसन्धि है, किन्तु जिस सन्धि में पैदावार के अलावा कुछ और भी देना पड़े उसको परदूषणसन्धि कहते हैं ।

( ३ ) इन चारों प्रकार की सन्धियों में पहिली आदिष्ट और उच्छिन्न, दो सन्धियों के समय शत्रु की विपत्ति की प्रतीक्षा करनी चाहिए, और पिछली दो सन्धियों में भूमि की पैदावार को लेकर अबलीयस प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों से शत्रु का प्रतीकार करना चाहिए । भूमि देने के कारण इन चारों सन्धियों को भूम्युपनतसन्धि या देशोपनतसन्धि इन नामों में भी कहा जाता है ।

( ४ ) इस प्रकार निर्बल राजा को उचित है कि वह उक्त दण्डोपनत, कोषोपनत और देशोपनत, इन तीन प्रकार की हीन सन्धियों को अपने कार्य, देश तथा समय के अनुसार उपयोग में लाये ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में हीनसन्धि नामक
तीसरा अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

३० कौ०