कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| प्रकरण १०१, १०२ | समहीनज्यायसा |
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| अध्याय ३ | गुणाभिनिवेशो हीनसन्ध्यश्च |
(१) विजिगीषुः शक्त्यपेक्षः षाड्गुण्यमुपयुञ्जीत । समज्यायोभ्यां सन्धयेत । हीनेन विगृह्णीयात् । विगृहीतो हि ज्यायसा हस्तिना पादयुद्धमिवाभ्युपैति । समेन चामं पात्रमामेनाहतमिवोभयतः क्षयं करोति । कुम्भेनेवाश्मा हीनेनैकान्तसिद्धिमवाप्नोति ।
(२) ज्यायांश्चेत् सन्धिमिच्छेत्, दण्डोपनतवृत्तमाबलीयसं वा योगमातिष्ठेत् ।
(३) समश्चेन्न सन्धिमिच्छेत्, यावन्मात्रमपकुर्यात् तावन्मात्रमस्य प्रत्यपकुर्यात् । तेजो हि सन्धानकारणं, नातप्तं लोहं लोहेन सन्धत्त इति ।
सम, हीन तथा बलवान् राजाओं के चरित्र; और हीन राजा के साथ सन्धि
( १ ) विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह अपने सामर्थ्य के अनुसार सन्धि आदि छह गुणों में जिसको उचित समझे उसी को व्यवहार में लाये । उसके लिए उचित यही है कि बराबर तथा बड़ी शक्ति वाले राजा के साथ वह सन्धि कर ले; और शक्तिहीन के साथ विग्रह कर दे । क्योंकि अधिक शक्ति वाले के साथ विग्रह करने पर हीन शक्ति राजा की वही दुर्दशा होती है, जो कि गजारोही सैनिकों के साथ युद्ध में पैदल लड़ने वाली सेना की होती है । और समान बल-विक्रम वाले के साथ विग्रह करने पर वे दोनों ही उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे दो कच्चे घड़े आपस में भिड़ जाने से दोनों ही नष्ट हो जाते हैं । और हीन शक्ति के साथ विग्रह करने का वही सुपरिणाम होता है जो पत्थर से घड़े पर चोट मारने से होता है ।
( २ ) यदि अधिक शक्तिशाली राजा सन्धि करने के लिए तैयार न हो तो दण्डोपनतवृत्त और आबलीयस अधिकरणों में निर्दिष्ट उपायों का प्रयोग करना चाहिए ।
( ३ ) यदि समान शक्ति वाला राजा सन्धि न करना चाहे तो वह जितना नुकसान पहुँचावे उतना ही नुकसान उसका भी करना चाहिए; क्योंकि तेज ही सन्धि का कारण सिद्ध होता है । बिना तपा लोहा दूसरे लोहे के साथ कभी नहीं मिल पाता है ।