कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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(१) दुर्गसम्पदुक्ता पुरस्तात् ।
(२) धर्माधिगतः पूर्वैः स्वयं वा हेमरूप्यप्रायश्चित्रस्थूलरत्नहिरण्यो दीर्घामप्यापदमनायतिं सहेतेति कोशसम्पत् ।
(३) पितृपैतामहो नित्यो वश्यस्तुष्टभृतपुत्रदारः प्रवासेष्वविसम्पादितः सर्वत्राप्रतिहतो दुःखसहो बहुयुद्धः सर्वयुद्धप्रहरणविद्याविशारदः सहवृद्धिक्षयिकत्वादद्वैध्यः क्षत्रप्राय इति दण्डसम्पत् ।
(४) पितृपैतामहं नित्यं वश्यमद्वैध्यं महल्लघुसमुत्थमिति मित्रसम्पत् ।
(५) अराजबीजी लुब्धः क्षुद्रपरिषदको विरक्तप्रकृतिरन्यायवृत्तिरयुक्तो व्यसनी निरुत्साहो दैवप्रमाणो यत्किञ्चनकार्यगतिरननुबन्धः क्लीबो नित्यापकारी चेत्यमित्रसम्पत् । एवम्भूतो हि शत्रुः सुखः समुच्छेत्तुं भवति ।
हो और जहाँ प्रेमी एवं शुद्ध स्वभाव वाले लोग वसते हों, इन गुणों से युक्त देश जनपद संपन्न कहा जाता है।
(१) दुर्ग के गुण: दुर्ग विधान नामक प्रकरण में दुर्ग-गुणों पर प्रकाश डाला जा चुका है ।
(२) कोष के गुण : राजकोष ऐसा होना चाहिए जिसमें पूर्वजों की तथा अपनी धर्म की कमाई संचित हो, इस प्रकार धान्य; सुवर्ण, चाँदी, नाना प्रकार के बहुमूल्य रत्न तथा हिरण्य से भरा-पूरा हो, जो दुर्भिक्ष एवं आपत्ति के समय सारी प्रजा की रक्षा कर सके । इन गुणों से युक्त खजाना कोष संपन्न कहलाता है ।
(३) दण्ड ( सेना ) के गुण : सेना ऐसी होनी चाहिए जिसमें वंशानुगत, स्थायी एवं वश में रहने वाले सैनिक भर्ती हों, जिनके स्त्री-पुत्र राजवृत्ति को पाकर पूरी तरह सन्तुष्ट हों, युद्ध के समय जिसको आवश्यक सामग्री से लैस किया जा सके, जो कहीं भी हार न खाता हो, दुःख को सहने वाला हो, युद्धकौशलों से परिचित हो, हर तरह के युद्ध में निपुण हो, राजा के लाभ तथा हानि में हिस्सेदार हो और क्षत्रियों की अधिकता हो । इन गुणों से युक्त सेना दण्डसंपन्न कही जाती है ।
(४) मित्र के गुण : मित्र ऐसे होने चाहिएँ, जो वंशपरम्परागत हों, स्थायी हों, अपने वश में रह सकें, जिनसे विरोध की संभावना न हो, प्रभु-मन्त्र-उत्साह आदि शक्तियों से युक्त जो समय आने पर सहायता कर सकें । मित्रों में इन गुणों का होना मित्रसंपन्न कहा जाता है ।
(५) शत्रु के गुण : जो शुद्ध राजवंश का न हो, लोभी हो, दुष्ट परिवार वाला हो, अमात्य आदि प्रकृतियाँ जिसके अनुकूल न हों, शास्त्र प्रतिकूल आचरण करने वाला हो, अयोग्य हो, व्यसनी हो, जिसमें उत्साह न हो, जो भाग्यवादी हो, विना विचारे कार्य करने वाला हो । शत्रु में इन गुणों का होना शत्रुसंपन्न कहा जाता है । इस प्रकार का शत्रु आसानी से उखाड़ा जा सकता है ।