कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context३२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) स्वस्वामिसम्बन्धस्तु भोगानुवृत्तिरुच्छिन्नदेशानां यथास्वं द्रव्याणाम् ।
(२) यत्स्वं द्रव्यमन्यैर्भुज्यमानं दशवर्षाण्युपेक्षेत, हीयेतास्य । अन्यत्र बालवृद्धव्याधितव्यसनिप्रोषितदेशत्यागराज्यविभ्रमेभ्यः ।
(३) विंशतिवर्षोपेक्षितमनुवसितं वास्तु नानुयुञ्जीत ।
(४) ज्ञातयः श्रोत्रियाः पाषण्डा वा राज्ञामसन्निधौ परवास्तुषु विवसन्तो न भोगेन हरेयुः; उपनिधिमाधिं निधिं निक्षेपं स्त्रियं सीमां राजश्रोत्रियद्रव्याणि च ।
(५) आश्रमिणः पाषण्डा वा महत्यवकाशे परस्परमबाधमाना वसेयुः । अल्पां बाधां सहेरन् । पूर्वागतो वा वासपर्यायं दद्यात् । अप्रदाता निरस्येत ।
(६) वानप्रस्थयतिब्रह्मचारिणामाचार्यशिष्यधर्मभ्रातृसमानतीर्थ्यारिक्थभाजः क्रमेण ।
(१) स्वस्वामि-सम्बन्ध : जिस संपत्ति को कोई व्यक्ति लगातार भोगता आ रहा हो । उसके संबंध में कोई साक्षी न मिलने पर भी, उस संपत्ति पर भोग करने वाले का ही अधिकार माना जाय ।
(२) जो व्यक्ति, दस वर्ष तक दूसरों के उपभोग में लायी गयी, अपनी संपत्ति की खोज खबर नहीं करता, उस संपत्ति पर उस व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं रह जाता है। किन्तु वह संपत्ति यदि ऐसे व्यक्तियों की हो, जो बाल, बूढे, बीमार, आपद्ग्रस्त, परदेश गये, देश त्यागी और राजकीय कार्य के लिए बाहर गये हों, तो दस वर्ष बाद भी अपनी संपत्ति पर उनका अधिकार बना रहता है ।
(३) यदि कोई किरायादार मालिक मकान की रजामंदी से बीस वर्ष तक उसके मकान पर रहे तो उस मकान पर किरायेदार का अधिकार हो जाता है ।
(४) बंधु-बांधव, श्रोत्रिय और पाखण्डी आदि व्यक्ति राजा से दूर दूसरों के मकानों में रहते हुए भी उनके मालिक नहीं सकते हैं । इसी प्रकार उपनिधि, आधि, निधि, निक्षेप, स्त्री, सीमा, राजा और श्रोत्रिय की वस्तुओं पर कोई भी व्यक्ति अधिकार नहीं कर सकता है ।
(५) आश्रमवासी और पाखंड (अवैदिक एवं व्रत-उपवास करने वाले) एक-दूसरे को किसी प्रकार की हानि न पहुँचाते हुए निवास करें । यदि एक-दूसरे को वे थोड़ी सी हानि पहुँचायें तो सहन कर लें । पहिले से रहने वाला व्यक्ति, बाद में आये व्यक्ति को स्थान दे दे; यदि स्थान न दे उसे बाहर कर दिया जाय ।
(६) वानप्रस्थी, संन्यासी और ब्रह्मचारियों की संपत्ति के उत्तराधिकारी क्रमशः उनके आचार्य, शिष्य और धर्म भाई या सहपाठी होते हैं ।